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इंदिरा गांधी ने विदेशी मुद्रा कानून से छूट दी थी मदर को….जानें क्यों

जिस व्यक्ति को कोई चाहने वाला न हो, कोई ख्याल रखने वाला न हो, जिसे हर कोई भूल चुका हो,मेरे विचार से वह किसी ऐसे व्यक्ति की तुलना में जिसके पास कुछ खाने को न हो,कहीं बड़ी भूख,कही बड़ी गरीबी से ग्रस्त है।
-मदर टेरेसा
श्रीराम गुप्ता।।
10 सितम्बर 1940 का एक आम दिन। एक सुन्दर, अध्ययनशील एवं परिश्रमी लड़की अपने वार्षिक अवकाश पर दार्जिलिंग जा रही थी। तभी उसकी अन्तरात्मा से आवाज़ उठी। आवाज सब कुछ त्याग कर देने की। अपना जीवन ईश्वर एवं दरिद्र नारायण की सेवा करने की। कुछ पुरानी यादें स्मृति पटल पर लौट रहीं थीं। जिसमें मात्र आठ साल वो लड़की अपने पिता के परलोक सिधारने के बाद माता पर अाश्रित हो गई।  लालन-पालन की सारी जिम्मेदारी उनकी माता द्राना बोयाजू के ऊपर आ गयी। वह पांच भाई-बहनों में सबसे छोटी थीं। उनके जन्म के समय उनकी बड़ी बहन की उम्र 7 साल और भाई की उम्र 2 साल थी, बाकी दो बच्चे बचपन में ही गुजर गए थे। पढाई के साथ-साथ, गाना उन्हें बेहद पसंद था। वह और उनकी बहन पास के गिरजाघर में मुख्य गायिका थीं। उसे यह भी याद आया कि वह मात्र बारह साल की थीं तभी उन्हें ये अनुभव हो गया था कि वो अपना सारा जीवन मानव सेवा में लगायेंगी।
       हम बात कर रहे हैं  18 साल की उम्र में उन्होंने ‘सिस्टर्स ऑफ़ लोरेटो’ में शामिल होने का फैसला लेने वाली अगनेस गोंझा बोयाजिजू की। जिन्हें मानवता की महान संत के रुप में मदर टेरेसा के नाम से पहचाना गया। मदर टेरेसा का जन्म 26 अगस्त, 1910 को स्कॉप्जे (अब मसेदोनिया में) में हुआ। उनके पिता निकोला बोयाजू एक साधारण व्यवसायी थे।  अलबेनियन भाषा में गोंझा का अर्थ फूल की कली होता है। आयरलैंड जाकर उन्होंने अंग्रेजी भाषा सीखी। अंग्रेजी सीखना इसलिए जरुरी था क्योंकि ‘लोरेटो’ की सिस्टर्स इसी माध्यम में बच्चों को भारत में पढ़ाती थीं। मदर टेरेसा के 108 वें जन्मदिवस पर उनसे जुड़ी जानकारियां जो अापको जानना चाहिए।
भारतीय वेषभूषा में मदर टेरेसा के इस सरल व प्रेम से ओत-प्रोत व्यक्तित्व से प्रभावित होकर स्वर्गीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने कहा  था – नम्रता और प्रेम की क्षमता का बहुत कुछ अनुभव तो मदर टेरेसा के दर्शन से ही हो जाता है।
एक नज़र में मदर का सफर:
  • सिस्टर टेरेसा आयरलैंड से 6 जनवरी, 1929 को कोलकाता में ‘लोरेटो कॉन्वेंट’ पंहुचीं। वह एक अनुशासित शिक्षिका थीं और विद्यार्थी उनसे बहुत स्नेह करते थे।
  • वर्ष 1944 में वह हेडमिस्ट्रेस बन गईं। उनका मन शिक्षण में पूरी तरह रम गया था पर उनके आस-पास फैली गरीबी, दरिद्रता और लाचारी उनके मन को बहुत अशांत करती थी।
  • वर्ष 1943 के अकाल में शहर में बड़ी संख्या में मौते हुईं और लोग गरीबी से बेहाल हो गए।
  • 1946 के हिन्दू-मुस्लिम दंगों ने तो कोलकाता शहर की स्थिति और भयावह बना दी। उन्होंने गरीबों, असहायों, बीमारों और लाचारों की जीवनपर्यांत मदद करने का मन बना लिया। इसके बाद मदर टेरेसा ने पटना के होली फॅमिली हॉस्पिटल से आवश्यक नर्सिग ट्रेनिंग पूरी की ।
  • वर्ष 1948 में वापस कोलकाता आ गईं और वहां से पहली बार तालतला गई, जहां वह गरीब बुजुर्गो की देखभाल करने वाली संस्था के साथ रहीं। उन्होंने मरीजों के घावों को धोया, उनकी मरहमपट्टी की और उनको दवाइयां दीं।
  • 7 अक्टूबर 1950 को उन्हें वैटिकन उन्हें वैटिकन से ‘मिशनरीज ऑफ़ चैरिटी’ की स्थापना की अनुमति मिल गयी। इस संस्था का उद्देश्य भूखों, निर्वस्त्र, बेघर, लंगड़े-लूले, अंधों, चर्म रोग से ग्रसित और ऐसे लोगों की सहायता करना था जिनके लिए समाज में कोई जगह नहीं थी।
  • मिशनरीज ऑफ़ चैरिटी’ का आरम्भ मात्र 13 लोगों के साथ हुआ था पर मदर टेरेसा की मृत्यु के समय (1997) 4 हजार से भी ज्यादा ‘सिस्टर्स’ दुनियाभर में असहाय, बेसहारा, शरणार्थी, अंधे, बूढ़े, गरीब, बेघर, शराबी, एड्स के मरीज और प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित लोगों की सेवा कर रही हैं।
  • मदर टेरेसा ने ‘निर्मल हृदय’ और ‘निर्मला शिशु भवन’ के नाम से आश्रम खोले । ‘निर्मल हृदय’ का ध्येय असाध्य बीमारी से पीड़ित रोगियों व गरीबों का सेवा करना था जिन्हें समाज ने बाहर निकाल दिया हो।
मिले सर्वोच्च सम्मान, बना दिया फंड:
  • मदर टेरेसा को मानवता की सेवा के लिए अनेक अंतर्राष्ट्रीय सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त हुए।
  • भारत सरकार ने उन्हें  पहले पद्मश्री (1962) और बाद में देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ (1980) से अलंकृत किया।
  • संयुक्त राज्य अमेरिका ने उन्हें वर्ष  1985 में मेडल आफ़ फ्रीडम 1985 से नवाजा।
  • मानव कल्याण के लिए किये गए कार्यों की वजह से मदर टेरेसा को 1979 में नोबेल शांति पुरस्कार मिला। उन्हें यह पुरस्कार ग़रीबों और असहायों की सहायता करने के लिए दिया गया था।
  • मदर टेरेसा ने नोबेल पुरस्कार की 192,000 डॉलर की धन-राशि को गरीबों के लिए एक फंड के तौर पर इस्तेमाल करने का निर्णय लिया।
गिरती सेहत के बावजूद जारी रही सेवा:
  •  वर्ष 1983 में 73 वर्ष की आयु में उन्हें पहली बार दिल का दौरा पड़ा। उस समय मदर टेरेसा रोम में पॉप जॉन पॉल द्वितीय से मिलने के लिए गई थीं।
  • इसके पश्चात वर्ष 1989 में उन्हें दूसरा हृदयाघात आया और उन्हें कृत्रिम पेसमेकर लगाया गया।
  • साल 1991 में मैक्सिको में न्यूमोनिया के बाद उनके ह्रदय की परेशानी और बढ़ गयी। इसके बाद उनकी सेहत लगातार गिरती रही।
  • 13 मार्च 1997 को उन्होंने ‘मिशनरीज ऑफ चैरिटी’ के मुखिया का पद छोड़ दिया।
  • 5 सितम्बर, 1997 को उन्होंने देह त्याग दी।
  • उनकी मृत्यु के समय तक ‘मिशनरीज ऑफ चैरिटी’ में 4000 सिस्टर और 300 अन्य सहयोगी संस्थाएं काम कर रही थीं जो विश्व के 123 देशों में समाज सेवा में कार्यरत थीं।
  • मानव सेवा और ग़रीबों की देखभाल करने वाली मदर टेरेसा को पोप जॉन पाल द्वितीय ने 19 अक्टूबर, 2003 को रोम में “धन्य” घोषित किया।
मदर पर उठते रहे सवाल:
  • पेशे से डॉक्टर और कुछ समय मदर टेरेसा की संस्था मिशनरीज ऑफ चैरिटी में काम कर चुके चटर्जी का दावा है कि मदर ने गरीबों के लिए किए गए अपने काम को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया।
  • अरूप चटर्जी की चर्चित किताब ‘मदर टेरेसा: द फाइनल वरडिक्ट’ मदर टेरेसा के काम पर कई सवाल उठाती है।
  • कोलकाता में ही पैदा हुए चटर्जी अब इंग्लैंड में रहते हैं। उनके मुताबिक मदर टेरेसा अक्सर कहती रहीं कि वे कलकत्ता की सड़कों और गलियों से बीमारों को उठाती थीं। लेकिन असल में उन्होंने या उनकी सहयोगी ननों ने कभी ऐसा नहीं किया।
  • लोग जब उन्हें बताते थे कि फलां जगह कोई बीमार पड़ा है तो उनसे कहा जाता था कि 102 नंबर पर फोन कर लो। अरूप चटर्जी के मुताबिक मदर टेरेसा की संस्था मिशनरीज ऑफ चैरिटी के केंद्रों में गरीबों का जानबूझकर ठीक से इलाज नहीं किया जाता था। मदर टेरेसा पीड़ा को अच्छा मानती थीं।उनका मानना था कि पीड़ा आपको जीसस के करीब लाती है जो मानवता के लिए सूली चढ़े थे। लेकिन जब वे खुद बीमार होती थीं तो इलाज करवाने देश-विदेश के महंगे अस्पतालों में चली जाती थीं।
  • अपनी किताब में चटर्जी ने यह तक कहा है कि मदर टेरेसा बीमार बच्चों की मदद करती थीं, लेकिन तभी जब उनके मां-बाप एक फॉर्म भरने के लिए तैयार हो जाते थे जिसमें लिखा होता था कि वे बच्चों से अपना दावा छोड़कर उन्हें मदर की संस्था को सौंपते हैं।
  • चटर्जी की किताब में यह भी कहा गया है कि मदर टेरेसा को गरीबों की मदद करने के लिए अकूत पैसा मिला लेकिन, उसका एक बड़ा हिस्सा उन्होंने खर्च ही नहीं किया। चटर्जी ने इस पर भी सवाल उठाया कि मदर टेरेसा ऐसे लोगों से भी फंडिंग लेती थीं जिनकी आय के स्रोत संदिग्ध थे। इनमें भ्रष्ट तानाशाह और बेईमान कारोबारी भी शामिल थे। जैसे उन्होंने चार्ल्स कीटिंग से भी पैसा लिया जिन्होंने अमेरिका में अपने घोटाले से खूब कुख्याति पाई थी।
  • अपने एक लेख में वरिष्ठ साहित्यकार विष्णु नागर लिखते हैं, ‘यह कहना कि मदर टेरेसा सड़क पर पड़े, मौत से जूझ रहे सभी गरीबों की मसीहा थीं, गलत है. उन्होंने गरीबों-बीमारों के लिए 100 देशों में 517 चैरिटी मिशन जरूर स्थापित किए थे मगर ऐसे कई मिशनों का दौरा करने के बाद डॉक्टरों ने पाया कि ये दरअसल जीवनदान देने से ज्यादा मृत्युदान देने के मिशन हैं। इन मिशनों में से ज्यादातर में साफ-सफाई तक का ठीक इंतजाम नहीं था, वहां बीमार का जीना और स्वस्थ होना मुश्किल था, वहां अच्छी देख-रेख नहीं होती थी, भोजन तथा दर्द निवारक औषधियां तक वहां नहीं होती थीं।
  • ब्रिटेन की प्रसिद्ध मेडिकल पत्रिका लैंसेट के सम्पादक डॉ रॉबिन फॉक्स ने भी 1991 में एक बार मदर के कोलकाता स्थित केंद्रों का दौरा किया था। फॉक्स ने पाया कि वहां साधारण दर्दनिवारक दवाइयां तक नहीं थीं। उनके मुताबिक इन केंद्रों में बहुत से मरीज ऐसे भी थे जिनकी बीमारी ठीक हो सकती थी। लेकिन वहां सबको इसी तरह से देखा जाता था कि ये सब कुछ दिनों के मेहमान हैं और इनकी बस सेवा की जाए।
  • एक टीवी कार्यक्रम के दौरान अरूप चटर्जी का भी कहना था कि संस्था के केंद्रों में मरीजों की हालत बहुत खराब होती थी। वे रिश्तेदारों से नहीं मिल सकते थे, न ही कहीं घूम या टहल सकते थे. वे बस पटरों पर पड़े, पीड़ा सहते हुए अपनी मौत का इंतजार करते रहते थे।
  • वर्ष 1994 में मदर टेरेसा पर बनी एक चर्चित डॉक्यूमेंटरी हैल्स एंजल में भी कुछ ऐसे ही आरोप लगाए गए। ब्रिटेन के चैनल फोर पर दिखाई गई इस फिल्म की स्क्रिप्ट क्रिस्टोफर हिचेंस द्वारा लिखी गई थी। वर्ष 1995 में हिचेंस ने एक किताब भी लिखी- द मिशनरी पोजीशन : मदर टेरेसा इन थ्योरी एंड प्रैक्टिस नाम की इस किताब में हिचेंस का कहना था कि मीडिया ने मदर टेरेसा का मिथक गढ़ दिया है जबकि सच्चाई इसके उलट है। लेख का सार यह था कि गरीबों की मदद करने से ज्यादा दिलचस्पी मदर टेरेसा की इसमें थी कि उनकी पीड़ा का इस्तेमाल करके रोमन कैथलिक चर्च के कट्टरपंथी सिद्धांतों का प्रचार-प्रसार किया जाए। इस किताब की खूब तारीफें हुईं तो आलोचनाएं भी।
  • 80 के दशक में ब्रिटेन के चर्चित अखबार ब्रिटेन में छपे एक लेख में चर्चित नारीवादी और पत्रकार जर्मेन ग्रीअर ने भी कुछ ऐसी बातें कहीं थीं। ग्रीअर ने मदर टेरेसा को एक धार्मिक साम्राज्यवादी कहा था जिसने सेवा को मजबूर गरीबों में ईसाई धर्म फैलाने का जरिया बनाया।
  • साल 2003 में लंदन के निवासी डॉक्टर अरूप चटर्जी ने भी टेरेसा की संस्था से जुड़े 100 लोगों का इंटरव्यू किया और उनके कामों पर एक तीखा लेख लिखा। अरूप के मुताबिक टेरेसा द्वारा बनवाए गए घरों में बाक़ी चीज़ों के अलावा स्वच्छता के बदतर हालात, सीरिंज में एक ही सूई का बार बार इस्तेमाल और देखभाल की घटिया व्यवस्था होती है।
  • वर्ष1975 में मदर टेरेसा का एक बयान विवादों में रहा था।  इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए आपातकाल पर उनका कहना था कि इससे लोग खुश हैं क्योंकि नौकरियां बढ़ी हैं और हड़तालें कम हुई हैं। गर्भनिरोधक उपायों और गर्भपात पर भी मदर टेरेसा के रुख ने आलोचनाएं बटोरीं।
मदर टेरेसा और इंदिरा गांधी के कुछ रोचक तथ्य-
  • भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के साथ मदर टेरेसा की मित्रता थी। इंदिरा गांधी ने मदर के स्वागत में कहा था, ‘उनसे मिलने पर मन में असीम करुणा और नम्रता उपजती है।
  • जब भी मदर का फोन आता तो वह स्वयं आकर बात किया करती थीं। उन्होंने अपने निजी सचिव को हिदायत दी थी कि जब भी मदर टेरेसा का फोन आए, उन्हें तुरंत सूचित किया जाए।
  • एक बार मदर टेरेसा दार्जिलिंग में अपने घर में थीं अचानक उनका पैर फिसल गया और वो गिर पड़ीं। उनके पैर में चोट आई, जब ये बात इंदिरा गांधी को पता चली तो वह मदर टेरेसा को देखने वहां गईं थीं।
  • इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री काल में मदर टेरेसा को विदेशी मुद्रा कानून से छूट दे दी गई थी। मदर टेरेसा को अपने कार्यों के लिए विदेशों से लाखों डॉलर प्रतिवर्ष मिलते थे।
  • इसके अतिरिक्त विभिन्न पुरस्कारों में सैकड़ों डॉलर मिलते थे। मदर टेरेसा इस धन को कुछ विदेशों में जमा रखना चाहती थीं। विदेशों में नए होम खोलने और पुराने होम चलाने, तथा उनके विस्तार के लिए विदेशी मुद्रा की आवश्यकता होती थी।
  • मदर चाहती थीं कि विदेश से मिले सारे धन का उपयोग केवल भारत में ही न हो, बल्कि भारत के बाहर भी कई गरीब देशों में इसका उपयोग हो सके। विदेशी मुद्रा कानून में छूट से मदर को विश्व के कई भागों में काम करने की सुविधा मिल गई थी।
 नीली बार्डर वाली साड़ी अब इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी 
संत की उपाधि से सम्मानित मदर टेरेसा की मशहूर नीले बार्डर वाली साड़ी को मिशनरीज ऑफ चैरिटी की ‘इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी’ के तौर पर मान्यता दी गयी है. इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी के वकील बिस्वजीत सरकार के अनुसार, ‘भारत सरकार की व्यापार चिह्न रजिस्ट्री ने नीले बार्डर की साड़ी के पैटर्न के लिये व्यापार चिह्न का पंजीकरण मंजूर किया है। अल्बानियाई मूल की मदर टेरेसा थोड़े समय के लिये नन भी रहीं। साल 1948 से वह कोलकाता की सड़कों पर गरीबों एवं निसहायों की सेवा करने लगीं। नीले बार्डर वाली सफेद रंग की साड़ी उनकी पहचान बन गयी थी, जिसका बाहरी किनारा दो अंदरूनी किनारों से अधिक चौड़ा होता था। नीले बार्डर की डिजाइन वाली साड़ी मिशनरीज ऑफ चैरिटी की नन पहना करती थीं जिसे चार सितंबर 2016 को मदर को सम्मानित किये जाने के दिन संगठन के लिये इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी के तौर पर मान्यता दी गयी। रंग व्यापार चिह्न संरक्षण के विचार के तहत नीले बार्डर का पैटर्न मिशनरीज ऑफ चैरिटी के लिये एक विशेष प्रतीकात्मक पहचान है। इसके लिये 12 दिसंबर 2013 को व्यापार चिहन रजिस्ट्री में आवेदन दायर किया गया था और करीब तीन साल की ‘सख्त कानूनी प्रक्रियाओं’ के बाद इसे मंजूरी मिली। हर साल ऐसी करीब 4000 साड़ियां तैयार की जाती हैं और दुनिया भर की ननों में इन्हें वितरित किया जाता है।

मदर टेरेसा के के अनमोल वचन

यदि हमारे मन में शांति नहीं है तो इसकी वजह है कि हम यह भूल चुके हैं कि हम एक दूसरे के हैं।
• यदि आप सौ लोगों को नहीं खिला सकते तो एक को ही खिलाइए।
• शांति की शुरुआत मुस्कराहट से होती है।
• जहां जाइए प्यार फैलाइए जो भी आपके पास आए वह और खुश होकर लौटे।
• सबसे बड़ी बीमारी कुष्ठ रोग या तपेदिक नहीं है ,बल्कि अवांछित होना ही सबसे बड़ी बीमारी है।
• चमत्कार यह नहीं की हम यह काम करते हैं बल्कि यह है कि ऐसा करने में हमें खुशी मिलती है।
• यदि आप चाहते हैं कि आपका प्रेम संदेश सुना जाए तो उसे बार-बार कहें,जैसे दीये को जलाए रखने के लिए बार-बार उसमें तेल डालते रहना जरूरी है।
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2 Comments

  1. Raveesh Raveesh August 25, 2018

    Very informative

  2. Abhishek Abhishek August 26, 2018

    Bahut khub

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