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एक थे अटल …

श्रीराम गुप्ता

ठन गई! मौत से ठन गई!
जूझने का मेरा इरादा न था, मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था,
रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई, यों लगा ज़िन्दगी से बड़ी हो गई।
मौत की उमर क्या है? दो पल भी नहीं, ज़िन्दगी सिलसिला, आज कल की नहीं।
मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूँ, लौटकर आऊँगा, कूच से क्यों डरूँ?
तू दबे पाँव, चोरी-छिपे से न आ, सामने वार कर फिर मुझे आज़मा।
मौत से बेख़बर, ज़िन्दगी का सफ़र, शाम हर सुरमई, रात बंसी का स्वर।
बात ऐसी नहीं कि कोई ग़म ही नहीं, दर्द अपने-पराए कुछ कम भी नहीं।
प्यार इतना परायों से मुझको मिला, न अपनों से बाक़ी हैं कोई गिला।
हर चुनौती से दो हाथ मैंने किये, आंधियों में जलाए हैं बुझते दिए।
आज झकझोरता तेज़ तूफ़ान है, नाव भँवरों की बाँहों में मेहमान है।
पार पाने का क़ायम मगर हौसला, देख तेवर तूफ़ाँ का, तेवरी तन गई।
मौत से ठन गई- अटल बिहारी वाजपेयी

भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी जी को एक दूरदर्शी राजनीतिज्ञ, अद्वितीय वक्ता, मर्मस्पर्शी कवि, सिद्धांतवादी नेता, जनप्रिय जननायक, विलक्षण संगठनकर्ता, प्रखर राष्ट्रवादी व 21वीं सदी के भारत की नींव रखने वाले अतुलनीय अटल बिहारी बाजपेयी को में युगों-युगों तक याद किया जाएगा । अटल बिहारी वाजपेयी भारत माता के एक ऐसे सपूत थे , जिन्होंने स्वतंत्रता से पूर्व और पश्चात भी अपना जीवन देश और देशवासियों के उत्थान एवं कल्याण हेतु जीया तथा जिनकी वाणी से असाधारण शब्दों को सुनकर आम जन उल्लासित होते रहे। जिनके कार्यों से देश का मस्तक ऊंचा हुआ। मघ्य प्रदेश के ग्वालियर में, एक ब्राह्मण परिवार में 25 दिसंबर, 1924 को इनका जन्म हुआ। पुत्रप्राप्ति से हर्षित पिता श्री कृष्ण बिहारी वाजपेयी को तब शायद ही अनुमान रहा होगा कि आगे चलकर उनका यह नन्हा बालक सारे देश और सारी दुनिया में नाम रौशन करेगा। पिता कृष्ण बिहारी वाजपेयी ग्वालियर में अध्यापन कार्य तो करते ही थे, इसके अतिरिक्त वे हिन्दी व ब्रज भाषा के सिद्धहस्त कवि भी थे। पुत्र में काव्य के गुण वंशानुगत परिपाटी से प्राप्त हुए। महात्मा रामचन्द्र वीर द्वारा रचित अमर कृति “विजय पताका” पढकर अटल जी ने जीवन की दिशा को बदल दिया। अटल की बी०ए० की शिक्षा ग्वालियर के विक्टोरिया कालेज (वर्तमान में लक्ष्मीबाई कालेज) में हुई। छात्र जीवन से वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक बने और तभी से राष्ट्रीय स्तर की वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में भाग लेने लगे। कानपुर के डी०ए०वी० कालेज से राजनीति शास्त्र में एम०ए० की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण करने के बाद उन्होंने अपने पिताजी के साथ-साथ कानपुर में ही एल०एल०बी० की पढ़ाई भी प्रारम्भ कर दी। पढ़ाई को बीच में ही विराम देकर पूरी निष्ठा से संघ के कार्य में जुट गये। राजनीति के दो गुरु डॉ॰ श्यामा प्रसाद मुखर्जी और पण्डित दीनदयाल उपाध्याय के निर्देशन में राजनीति का पाठ पढ़ने के साथ-साथ पाञ्चजन्य, राष्ट्रधर्म, दैनिक स्वदेश और वीर अर्जुन जैसे पत्र-पत्रिकाओं के सम्पादन का कार्य भी कुशलता पूर्वक करते रहे।

 

जब एक मौत ने पत्रकार अटल को बना दिया राजनेता अटल –

अटल एक पत्रकार बनाना चाहते थे। लेकिन जब श्रीनगर के सरकारी अस्पताल में नज़रबंदी की अवस्था में डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी का निधन हो गया तो उनके अधूरे काम को पूरा करने के लिए अटल ने राजनीति के क्षेत्र में कूदने का फैसला किया।अटल ने अपनी खुद की राजनैतिक पार्टी भारतीय जनसंघ की स्थापना की। वर्ष 1968 से 1973 तक उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष भी रहे। अटल बिहारी वाजपेयी ने 1955 में पहली बार लोकसभा चुनाव लड़ा था लेकिन वह हार गए थे। सन् 1957 में अटल बिहारी वाजपेयी पहली बार सांसद बनकर लोकसभा में आए। अटल उत्तर प्रदेश, नई दिल्ली और मध्य प्रदेश से लोकसभा का चुनाव लड़े और जीते। 1996 में वो पहली बार देश के प्रधानमंत्री मात्र 13 दिनों के लिए बने।1998 में वह फिर से पीएम बने और 2004 तक रहे। वाजपेयी कुल 10 बार लोकसभा सांसद रहे। दो बार 1962 और 1986 में राज्यसभा सांसद रहे।

1996 में सरकार गिर जाने के बाद अटल बिहारी वाजपेयी की संसद में दहाड़ –
“हम भी अपने देश की सेवा कर रहे हैं। अगर हम देशभक्त नहीं होते, अगर हम नि:स्वार्थ भाव से राजनीति में अपना स्थान बनाने का प्रयास न करते और हमारे इस प्रयास के पीछे 40 साल की साधना है। यह कोई आकस्मिक जनादेश नहीं है, यह कोई चमत्कार नहीं हुआ है। हमने मेहनत की, हम लोगों में गए हैं, हमने संघर्ष किया है। यह 360 दिन चलने वाली पार्टी है, यह कोई चुनाव में खड़ी होने वाला पार्टी नहीं है और आज हमें अकारण कटघरे में खड़ा किया जा रहा है क्योंकि हम थोड़ी सी ज्यादा सीटें नहीं ले पाए। हम मानते हैं हमारी कमज़ोरी है। हमें बहुमत मिलना चाहिए था। राष्ट्रपति ने हमें अवसर दिया, हमने उसका लाभ उठाने की कोशिश कि लेकिन हमें सफलता नहीं मिली वह अलग बात है। लेकिन फिर भी हम सदन में सबसे बड़े विरोधी दल के रूप में बैठेंगे। आपको हमारा सहयोग लेकर सदन चलाना पड़ेगा, यह बात समझ लीजिये. लेकिन सदन चलाने में और ठीक से चलाने में हम आपको सहयोग देंगे यह आश्वासन देते हैं। लेकिन सरकार आप कैसे बनाएंगे, वह सरकार कैसे चलेगी वह मैं नहीं जनता। आप सारा देश चलाना चाहते हैं, बहुत अच्छी बात है, हमारी शुभकामनाएं आपके साथ हैं। हम देश की सेवा के कार्य में लगे रहेंगे। हम संख्या बल के सामने सर झुकाते हैं और आप को विश्वास दिलाते हैं कि जो कार्य हमने अपने हाथ में लिया है वह जबतक राष्ट्रीय उद्देश्य पूरा नहीं कर लेंगे तब तक विश्राम नहीं करेंगे, आराम से नहीं बैठेंगे। अध्यक्ष महोदय, मैं अपना त्यागपत्र राष्ट्रपति महोदय को देने जा रहा हूं”।

जब अटल ने कहा आज जिंदा हूँ तो राजीव गांधी की वजह से-
1987 में अटल बिहारी वाजपेयी किडनी की समस्‍या से ग्रसित थे। उस वक्‍त उसका इलाज अमेरिका में ही संभव था। लेकिन आर्थिक साधनों की तंगी के कारण वह अमेरिका नहीं जा पा रहे थे। इस दौरान तत्‍कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी को पता नहीं कैसे वाजपेयी की बीमारी के बारे में पता चल गया। उन्‍होंने अपने दफ्तर में वाजपेयी को बुलाया। उसके बाद कहा कि वे उन्‍हें संयुक्‍त राष्‍ट्र में न्‍यूयॉर्क जाने वाले भारत के प्रतिनिधिमंडल में शामिल कर रहे हैं। इसके साथ ही यह भी जोड़ा कि उन्हें उम्‍मीद है कि वे इस मौके का लाभ उठाकर वहां अपना इलाज भी करा सकेंगे। इस घटना का ज़िक्र मशहूर पत्रकार करण थापर ने अपनी हाल में प्रकाशित किताब द डेविल्‍स एडवोकेट में लिखा है कि 1991 में राजीव गांधी की हत्‍या के बाद अटल बिहारी वाजपेयी ने उनको याद करते हुए इस बात को पहली बार सार्वजनिक रूप से बताया कि, ”मैं न्‍यूयॉर्क गया और इस वजह से आज जिंदा हूं।”दरअसल न्‍यूयॉर्क से इलाज कराकर जब वह भारत लौटे तो इस घटना का दोनों ही नेताओं ने किसी से भी इस बात का जिक्र नहीं किया।

जब नेहरू ने माना अटल का लोहा-
1957 में जब अटल बिहारी वाजपेयी बलरामपुर से पहली बार लोकसभा सदस्‍य बनकर पहुंचे तो सदन में उनके भाषणों ने तत्‍कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू को बेहद प्रभावित किया। विदेश मामलों में वाजपेयी की जबर्दस्‍त पकड़ के पंडित नेहरू कायल हो गए। उस जमाने में वाजपेयी लोकसभा में सबसे पिछली बेंचों पर बैठते थे। लेकिन इसके बावजूद पंडित नेहरू उनके भाषणों को खासा तवज्‍जो देते थे।
ब्रिटिश प्रधानमंत्री भारत की यात्रा पर आए तो पंडित नेहरू ने वाजपेयी से उनका विशिष्‍ट अंदाज में परिचय कराते हुए कहा, “इनसे मिलिए। ये विपक्ष के उभरते हुए युवा नेता हैं। मेरी हमेशा आलोचना करते हैं लेकिन इनमें मैं भविष्य की बहुत संभावनाएं देखता हूं।”

जब सोनिया गांधी को डांटते हुए सिखाई थी अटल ने सभ्यता-
सोनिया गांधी ने सरकार पर हमला बोलने के लिए जिन शब्दों का चयन किया था वह तत्कालीन पीएम वाजपेयी को नागवार गुजरे। अटल ने कहा आपने(सोनिया गांधी) एक ही वाक्य में अक्षम, असंवेदनशील ,गैर जिम्मेदार और भ्रष्टतम शब्द प्रयोग किया है। राजनीतिक क्षेत्र में आपके साथ जो कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रहे हैं आज इसी देश में मतभेद होंगे, उनके बारे में आपका ये मूल्यांकन है मतभेद प्रकट करने का ये तरीका है? ऐसा लगता है जैसे शब्दकोश से शब्द ढूंढे गए हैं।’ उन्होंने अपने भाषण में सोनिया गांधी से कहा कि भारत में इन शब्दों के प्रयोग से अपने राजनीतिक विरोधियों पर हमला करने की सभ्यता नहीं रही।

जब विमान हाईजैकर के सामने खड़े हो गए अटल, बचाई थीं 48 जिंदगियां-
जनवरी 1992 अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री काल में हुए कंधान विमान अपहरण कांड के बारे में काफी लोगों को जानकारी है। लेकिन यह कम ही लोगों को पता है कि कंधार विमान अपहरण से एक दशक पहले वाजपेयी ने खुद अपनी जान पर खेलकर 48 लोगों को जान बचाई थी। उस समय खुद वाजपेयी हाइजैकर के सामने खड़े हो गए थे। यह पूरा मामला 22 जनवरी 1992 का है। उस दिन लखनऊ से दिल्ली की उड़ान भर रही इंडियन एयरलाइंस के विमान को उड़ान भरने के 15 मिनट बाद हाइजैक कर लिया गया। हाइजैकर ने विमान को केमिकल बम से उड़ाने की धमकी दी। उड़ान में सवार एक शख्स ने अपने पास केमिकल बम होने का दावा किया और फ्लाइट को वापस लखनऊ हवाई अड्डे ले जाने के लिए कहा। इस पर विमान में सवार सभी लोगों की सांसे थम गई। विमान हाईजैक होने की सूचना से सुरक्षा एजेंसियों में हड़कंप मच गया। अपहरणकर्ता की बात मानते हुए विमान को लखनऊ एयरपोर्ट पर लैंड किया गया। सुरक्षा एजेंसियों ने हाईजैकर से संपर्क किया तो उसने मांग की कि उसे विपक्ष के बड़े नेता अटल बिहारी वाजपेयी से मिलना है। यदि मुलाकात नहीं हुई तो वह विमान को बम से उड़ा देगा। किस्मत से उस दिन वाजपेयी जी समेत तमाम विपक्षी नेता लखनऊ में ही थे। उस समय पूर्व प्रधानमंत्री सर्किट हाउस में खाना खा रहे थे। इस दौरान लखनऊ के डीएम भागे हुए वाजपेयी जी के पास आए। उन्होंने वाजपेयी जी से कहा कि आपका इस समय लखनऊ एयरपोर्ट चलना जरूरी है। उन्होंने वाजपेयी जी को पूरी बात बताई । इसके बाद अटल जी वहां से सीधे एयरपोर्ट के लिए रवाना हो गए। अटल बिहारी वाजपेयी को पहले एयर ट्रैफिक कंटोलर के टावर पर ले जाया गया। वहां से अटल ने अपहरणकर्ता से बात की, लेकिन उसे वाजपेयी की आवाज को पहचानने से इंकार कर दिया. वह लगातार विमान को उड़ाने की धमकी दे रहा था. इसके बाद वाजपेयी, डीएम और लालजी टंडन जीप में बैठकर विमान के पास पहुंचे. विमान के नीचे फिर से हाईजैकर की वाजपेयी से बात कराई गई लेकिन उसने इस बार भी आवाज को पहचानने से इनकार कर दिया। इसके बाद अटल जी ने प्लेन के अंदर जाने का फैसला किया। इस दौरान अटल बिहारी वाजपेयी के साथ लालजी टंडन भी थे। वह अपहरणकर्ता के सामने खड़े हो गए। लालजी टंडन ने हाईजैकर से कहा कि तुम वाजपेयी से मिलना चाहते थे वह तुम्हारे सामने खड़े हैं, तुम अपनी मांग रखो और इनके पैर छू लो। जैसे ही हाईजैकर वाजपेयी के पैर छूने के लिए आगे आया सुरक्षाबलों ने उसे पकड़ लिया।

इमरजेंसी के दौर में वाजपेयी की वह 3 लाइनें…जब अटल की दीवानी जनता ने इंदिरा मुर्दाबाद और अटल जिंदाबाद के नारे लगाए-
साल 1975 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी की घोषणा कर दी। विपक्षी दलों के नेताओं ने जोर-शोर से इसका विरोध किया। भारी विरोध के बीच इंदिरा गांधी को झुकना पड़ा और 1977 में चुनाव का ऐलान किया गया। इमरजेंसी खत्म होने पर दिल्ली के रामलीला मैदान में रैली का आयोजन किया गया । इस रैली में अटल बिहारी वाजपेयी भी पहुंचे। भाषण देने के लिए वे जैसे ही मंच पर खड़े हुए वहां ‘इंदिरा गांधी मुर्दाबाद’ और अटल बिहारी जिंदाबाद के नारे लगने लगे अटल बिहारी वाजपेयी ने भीड़ को शांत रहने का इशारा किया. इसके बाद अपने खास अंदाज में थोड़ी देर शांत रहने के बाद कहा- ‘बाद मुद्दत मिले हैं दीवाने.’ इसके बाद वे फिर से शांत हो गए और अपनी आंखें मूंद ली. इसके बाद खचाखच भरे रामलीला मैदान में भीड़ दीवानी हो गई. पूरे वातावरण में जिंदाबाद का नारा गूंजायमान होने लगा।. इसके बाद वाजपेयी ने एक बार फिर से आंखें खोली और भीड़ को शांत रहने का इशारा किया. इसके बाद कहा- ‘कहने सुनने को बहुत हैं अफसाने.’ एक बार फिर से भीड़ नारे लगाने लगी. फिर वाजपेयी ने कहा- ‘खुली हवा में जरा सांस तो ले लें, कब तक रहेगी आजादी भला कौन जाने।

जब श्‍मशान में थे नरेंद्र मोदी, तब मुख्यमंत्री बनाने के लिए आया अटल बिहारी वाजपेयी का फोन-
नब्‍बे के दशक के अंत में गुजरात बीजेपी में केशुभाई पटेल, शंकर सिंह वाघेला जैसे नेताओं के बीच सत्‍ता के लिए घमासान मचा हुआ था। नतीजा यह हुआ कि सूबे में पार्टी संगठन के सबसे कद्दावर चेहरे नरेंद्र मोदी को दिल्‍ली भेज दिया गया। दिल्‍ली के पार्टी ऑफिस में ही नरेंद्र मोदी का ज्‍यादा वक्‍त गुजरता था। लालकृष्‍ण आडवाणी के करीबी होने के साथ साथ वह अटल बिहारी वाजपेयी के भी करीबी बने। 2001 में गुजरात के भुज में भूकंप आने के बाद केशुभाई पटेल के नेतृत्‍व में बीजेपी सरकार को विपक्ष के इस आरोप का सामना करना पड़ा कि वह स्थितियों को ठीक ढंग से संभाल नहीं पाई। नतीजा यह हुआ कि उसके बाद हुए उपचुनावों में पार्टी को नुकसान हुआ. पार्टी ने चुनावों के लिहाज से खतरे को भांपते हुए गुजरात में मुख्‍यमंत्री बदलने की मुहिम शुरू कर दी। इस कड़ी में अटल बिहारी वाजपेयी ने 2001 में एक दिन नरेंद्र मोदी को फोन किया। उन्‍होंने पूछा कि आप कहां हैं और क्‍या मुझसे मिलने आ सकते हैं? नरेंद्र मोदी ने कहा कि इस वक्‍त मैं शमशान में हूं। चिंतित वाजपेयी ने परिवार के संबंध में जब कुशलक्षेम पूछी तो मोदी ने कहा कि दरअसल मैं एक पत्रकार गोपाल के अंतिम संस्‍कार में आया हूं। माधव राव सिंधिया के साथ प्‍लेन क्रैश में उनकी भी मृत्‍यु हो गई है। हर कोई सिंधिया की अंतिम यात्रा में गया है और दो-तीन मित्रों को छोड़कर कोई भी गोपाल की अंतिम यात्रा में नहीं आया है, लिहाजा उनके प्रति संवेदना प्रकट करने के लिए मैं आ गया हूं। उसके बाद जब नरेंद्र मोदी, अटल बिहारी वाजपेयी से मिलने पहुंचे तो उनको गुजरात की गद्दी संभालने के लिए कहा गया। इस तरह सात अक्‍टूबर, 2001 को नरेंद्र मोदी पहली बार गुजरात के मुख्‍यमंत्री बने. उसके बाद उनका सियासी कद लगातार बढ़ता गया और अटल बिहारी वाजपेयी के बाद बीजेपी की तरफ से प्रधानमंत्री के पद तक पहुंचने वाले दूसरे नेता बने।

जब अमिताभ बच्चन की पेशकश पर अटल जी के अल्फाजों को जगजीत सिंह ने पिरोया गीतों में..

देश की चार हस्तियों की जुगलबंदी ने अटल की पंक्तियों को गीतों में पिरोया। बॉलीवुड के महानायक अमिताभ बच्चन अटल बिहारी वाजपेयी की तारीफों के शब्द कह रहे हैं. ये शब्द मशहूर लेखक जावेद अख्तर ने लिखे हैं और इसको अपनी आवाज में जगजीत सिंह ने पिरोया था।
गीत की कुछ पंक्तियाँ-
क्या खोया क्या पाया जग में,मिलते और बिछड़ते मग में,
मुझे किसी से नहीं शिकायत,यधपि छला गया पग-पग में,
एक दृष्टि बीती पर डालें,यादों की पोटली टटोलें,
जन्म मरण का अविरत फेरा,जीवन बंजारों का अविरत डेरा,
आज यहाँ कल वहाँ कूच है,कौन जानता किधर सवेरा,
अंधियारा आकाश असीमित,प्राणों के पखों को तौलें,
अपने ही मन से कुछ बोलें…

ड्रीम गर्ल के फैन रहे हैं वाजपेयी, इस फिल्म को देखा था 25 बार-
वाजपेयी जी लिखृने-पढ़ने के अलावा फिल्म देखना भी पसंद करते थे।हेमा मालिनी ने बताया कि अटल बिहारी वाजपेयी को उनकी एक फिल्म इतनी ज्यादा पसंद आयी कि उन्होंने 25 बार देखी थी. यह फिल्म 1972 में आई सीता और गीता थी। हेमा मालिनी ने इसी दौरान इस पूरे किस्से का जिक्र करते हुए बताया था कि मुझे याद है कि एक बार मैंने पदाधिकारियों से कहा कि मैं भाषणों में अटल बिहारी वाजपेयी का जिक्र करती हूं. लेकिन उनसे कभी मिली नहीं, मिलवाइए, तब वो मुझे उनसे मिलाने ले गए। लेकिन मैंने महसूस किया कि अटल बिहारी वाजपेयी बात करने में कुछ हिचकिचा रहे हैं। इस पर मैंने वहां मौजूद एक महिला से पूछा कि क्या बात है. अटल जी, ठीक से बात क्यों नहीं कर रहे। उन्होंने बताया कि असल में ये आपके बहुत बड़े प्रशंसक रहे हैं। इन्होंने 1972 में आई आपकी फिल्म ‘सीता और गीता’ 25 बार देखी थी. इसलिये वह अचानक आपको सामने पाकर हिचकिचा रहे हैं।

कवि के रूप में अटल-
अटल बिहारी वाजपेयी राजनीतिज्ञ होने के साथ-साथ एक कवि भी हैं। मेरी इक्यावन कविताएँ अटल जी का प्रसिद्ध काव्यसंग्रह है। वाजपेयी जी को काव्य रचनाशीलता एवं रसास्वाद के गुण विरासत में मिले हैं। उनके पिता कृष्ण बिहारी वाजपेयी ग्वालियर रियासत में अपने समय के जाने-माने कवि थे। वे ब्रजभाषा और खड़ी बोली में काव्य रचना करते थे। पारिवारिक वातावरण साहित्यिक एवं काव्यमय होने के कारण उनकी रगों में काव्य रक्त-रस अनवरत घूमता रहा है। उनकी सर्व प्रथम कविता ताजमहलथी। इसमें शृंगार रस के प्रेम प्रसून न चढ़ाकर “एक शहंशाह ने बनवा के हसीं ताजमहल, हम गरीबों की मोहब्बत का उड़ाया है मजाक” की तरह उनका भी ध्यान ताजमहल के कारीगरों के शोषण पर ही गया। वास्तव में कोई भी कवि हृदय कभी कविता से वंचित नहीं रह सकता। राजनीति के साथ-साथ समष्टि एवं राष्ट्र के प्रति उनकी वैयक्तिक संवेदनशीलता आद्योपान्त प्रकट होती ही रही है। उनके संघर्षमय जीवन, परिवर्तनशील परिस्थितियाँ, राष्ट्रव्यापी आन्दोलन, जेल-जीवन आदि अनेक आयामों के प्रभाव एवं अनुभूति ने काव्य में सदैव ही अभिव्यक्ति पायी।

वाजपेयी जी की वो कविताएं, जिस पर बजी सबसे ज्‍यादा तालियां-

.बाधाएं आती हैं आएंघिरें प्रलय की घोर घटाएं,
पावों के नीचे अंगारे,सिर पर बरसें यदि ज्वालाएं,
निज हाथों में हंसते-हंसते,आग लगाकर जलना होगा।
कदम मिलाकर चलना होगा।।

.टूटे हुए सपनों की कौन सुने सिसकी
अन्तर की चीर व्यथा पलकों पर ठिठकी
हार नहीं मानूंगा, रार नहीं ठानूंगा,
काल के कपाल पे लिखता मिटाता हूं
गीत नया गाता हूं।।

. अपनी ही छाया से बैर,गले लगने लगे हैं ग़ैर,
ख़ुदकुशी का रास्ता, तुम्हें वतन का वास्ता।
बात बनाएं, बिगड़ गई , दूध में दरार पड़ गई।

. दिन दूर नहीं खंडित भारत को ,पुन: अखंड बनाएंगे।
गिलगित से गारो पर्वत तकआज़ादी पर्व मनाएंगे॥
उस स्वर्ण दिवस के लिए आज सेकमर कसें बलिदान करें।
जो पाया उसमें खो न जाएं,जो खोया उसका ध्यान करें॥

अटल′ था वाजपेयी का पोखरण परीक्षण का इरादा, ऐसे न्यूक्लियर देश बना भारत-
11 मई 1998 का दिन भारत के इतिहास के पन्नों का एक ऐसा दिन है जिसने भारत को एक नई जीत दिलाई थी लेकिन इस जीत और पहल का सारा श्रेय अटल बिहारी वाजपेयी को ही जाता है. दरअसल, 11 मई 1998 को राजस्थान के पोखरण में तीन बमों का सफल परीक्षण किया गया था और इसके साथ ही भारत न्यूक्लियर स्टेट बन गया. यह देश के लिए गर्व का पल था. हालांकि, भारत को परमाणु राष्ट्र बनाना आसान नहीं था. अटल बिहारी वाजपेयी 1996 में ही भारत को परमाणु राष्ट्र बनाना चाहते थे। जिस वक्त उन्होंने प्रधानमंत्री की कुर्सी संभाली थी और पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने उन्हें परमाणु बम के बारे में बताया था. लेकिन उस वक्त वाजपेयी की सरकार 13 दिन से ज्यादा नहीं टिक पाई थी और इस वजह से उन्होंने इस फैसले को रद्द कर दिया था। 1995 में वर्तमान प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने परीक्षण की सभी तैयारियां कर ली थी लेकिन किसी वजह से वह इस परीक्षण को अंजाम नहीं दे पाए। इसके पीछे कई थ्योरी बताई जाती हैं। जिसमें से एक के मुताबिक अमेरिकी उपग्रहों को पोखरण में तैयारी के बारे में पता चल गया था, जिस वजह से उस वक्त परीक्षण को निरस्त करना पड़ा था। इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट के मुताबिक 1996 में 13 दिन तक सरकार में रहने के दौरान अटल ने इकलौता परमाणु कार्यक्रम को हरी झंडी दिखाने का फैसला किया था लेकिन जब उन्हें लगा कि उनकी सरकार स्थिर नहीं है तो उन्होंने इस फैसेल को रद्द कर दिया था। इन सभी घटनाओं से एक बात तो साफ है कि अटल और नरसिम्हा राव दोनों ही भारत को परमाणु राष्ट्र बनाना चाहते थे। न्यूकलर परीक्षण के काम को चोरी छिपे लगातार किया जा रहा था। केवल पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और कुछ अन्य लोगों को ही परीक्षण से पूर्व इसकी जानकारी थी. अटल कई कारणों से परीक्षण जल्दी करना चाहते थे। वह जानते थे कि चीन के पास परमाणु हथियार हैं और पाकिस्तान ने भी गौरी मिसाइल सफलतापूर्वक टेस्ट कर ली थी। पाकिस्तान के सूचना मंत्री मुशाहिद हुसैन गौरी के विकास को ‘दक्षिण एशिया में शक्ति संतुलन का प्रयास’ बता रहे थे। गौरी के अलावा पाकिस्तान ‘गज़नवी मिसाइल’ पर भी काम कर रहा था. वहीं चीन-पाकिस्तान की बढ़ती नजदीकियां भी भारत के लिए खतरा बन रही थी। अमेरिका और जापान समेत कई पश्चिमी देश भी भारत पर CTBT पर साइन करने के लिए दबाव डाल रहे थे। 11 मई 1998 को अटल ने अपने घर पर रखी थी प्रेस कांफ्रेंस परीक्षण की इजाजत देने के बाद कुछ देर तक परीणाम जानने का इंतजार करने के बाद अटल ने अपने घर पर एक प्रेस कांफ्रेंस बुलाई थी। इस प्रेस कांफ्रेंस में उन्होंने सफल परमाणु परीक्षण की जानकारी देते हुए कहा था, ‘आज 15:45 बजे, भारत ने तीन अंडरग्राउंड न्यूक्लियर टेस्ट को पोखरण में अंजाम दिया। आज किया गया यह परीक्षण एक विखंडन उपकरण, कम उपज डिवाइस और थर्मोन्यूक्लियर डिवाइस से लेस था. उसका उपज अपेक्षित मूल्यों के अनुरूप मापा गया है. मापन ने यह भी पुष्टि की है कि वातावरण में रेडियोधर्मिता से बाहरी लोगों को कोई नुकसान नहीं हुआ. इस प्रयोग भी 1974 में किए गए प्रयोग के जैसे विस्फोट का इस्तेमाल किया गया था। मैं सभी वैज्ञानिकों और इंजीनियर जिन्होंने इस परीक्षण को सफल बनाने में मदद की को बधाई देता हूं.’ हालांकि, वह हमेशा ही इस परीक्षण का श्रेय पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव को देते हैं।

जब 3 दिन मैदान-ए-जंग में डटे रहे अटल बिहारी वाजपेयी, सेना को दिया था एक ‘अटल’ आदेश-

वर्ष 1999 जब कारगिल में भारत-पाकिस्तान के बीच युद्ध हुआ। प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी इस युद्ध को हर हाल जीतने के लिए बेताब थे। युद्ध जैसे-जैसे आगे बढ़ने लगा, अटल जान चुके थे, ये युद्ध पहले हुए युद्ध सरीखे आसान नहीं हैं। इसलिए उन्होंने खुद मैदान-ए-जंग में जाकर अफसरों और जवानों का हौसला बढ़ाने का फैसला लिया। युद्ध के दौरान ही अटल कारगिल पहुंच गए और तीन दिन वहां रहे। वहां उन्होंने सेना के जवानों और अफसरों से युद्ध की स्थिति का जायजा लेते हुए वहीं रहकर उनकी हौसला आफजाई की। प्रधानमंत्री की ओर से युद्ध को तुरंत पालीटिकल क्लीयरेंस दिलवाई गई और सेना को फ्री हैंड कर दिया गया। युद्ध मैदानी नहीं था, फौज के सामने ऐसा दुश्मन था, जिसे देख पाना तो दूर, पहले ढूंढना था और फिर उसे ढेर करना था। इस युद्ध को जीतने में कितना समय लगेगा, कुछ मालूम नहीं था। लेकिन तत्कालीन पीएम अटल बिहारी, अन्य मंत्रियों और सेना के आला अफसरों ने तय किया कारगिल की चोटियों पर बर्फ पिघलते ही भारतीय फौज हमला करेगी और बर्फ पड़ने से पहल हर हाल में फतेह सुनिश्चित करेगी। मई में कारगिल युद्ध की शुरुआत कर दी गई और 26 जुलाई को ऑपरेशन विजय यानी कारगिल पर फतेह कर युद्ध का औपचारिक समापन किया गया। सन 1962, 1965 और 1971 के युद्ध के दौरान ऐसी व्यवस्था नहीं थी कि युद्ध में शहीद होने वाली सभी शव उनके घरों तक पहुंचाएं जाए। जहां जवान और अफसर शहीद होते थे, वहीं उनका दाह संस्कार कर उनकी अस्थियों को घरों तक पहुंचा दिया जाता था। लेकिन कारगिल युद्ध की जब रणनीति तय की गई तो तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की ओर से एक खास ‘अटल’ आदेश भी दिया गया। अटल जी ने ये आदेश सैनिक सम्मान के मद्देनजर मौजूदा सरकार और फौज को जारी किया था। इस आदेश में कहा गया था कि कारगिल युद्ध चूंकि दुर्गम चोटियों पर लड़ा जाना है, इसलिए ये बात सुनिश्चित की जाए कि जो भी जवान या अफसर किसी भी दुर्गम चोटी पर शहीद होता है, तो उसका शव उसके घर तक जरूर पहुंचेगा। भले इसके लिए जितने भी संसाधनों की आवश्यकता पड़े, वो उपलब्ध करवाए जाएंगे। अटल के आदेशों के बाद फौज ने भी ये आदेश जारी किए कि कारगिल मे जो भी शहीद होगा, उसका शव स्ट्रैचर के जरिए बेस कैंप लाया जाएगा। फिर वहां से स्पेशल आर्मी वाहनों और विमानों के जरिए तिरंगे में लिपटे शूरवीरों के शवों को ताबूत में रखकर उनके घरों तक पहुंचाया जाएगा। इन्ही आदेशों के बाद न केवल कारगिल, बल्कि आज भी जो जवान या अफसर शहीद होता है, उसका शव घर तक पहुंचता है और इस शहादत पर लोगों का भारी हुजूम भी उमड़ता है।

अटल बिहारी वाजपेयी के वो अहम फैसले, जिसने हमेशा के लिए बदल दी भारत की तकदीर-

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ऐसे पहले गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री थे, जिन्होंने पांच साल का कार्यकाल पूरा किया. हालांकि, सिर्फ यही उनकी उपलब्धियों में शुमार नहीं है. उनकी सबसे बड़ी उपलब्धी आर्थिक मोर्चे पर रही। उन्होंने 1991 में नरसिम्हाराव सरकार के दौरान शुरू किए गए आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाया. 2004 में जब मनमोहन सिंह ने वाजपेयी सरकार के बाद सत्ता संभाली तब अर्थव्यवस्था की तस्वीर बेहद मजबूत थी। जीडीपी ग्रोथ रेट 8 फीसदी से अधिक था. महंगाई दर 4 फीसदी से कम थी और विदेशी मुद्रा भंडार पूरी तरह भरा था। वाजपेयी ने आर्थिक मोर्चे पर जो कदम उठाए, उससे न केवल उनकी पार्टी बीजेपी को वास्तविक आर्थिक अधिकार रखने वाली पार्टी की छवि मिली, बल्कि भारत को भी आर्थिक प्रगति की तरफ बढ़ने में मदद मिली।

  • अटल बिहारी वाजपेयी की सबसे बड़ी उपलब्धियों में उनकी महत्वाकांक्षी सड़क परियोजनाओं को देखा जाता है, जिसे उन्होंने लॉन्च किया था. इनमें स्वर्णिम चतुर्भुज और प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना शामिल हैं। स्वर्णिम चतुर्भुज योजना ने चेन्नई, कोलकाता, दिल्ली और मुंबई को हाईवे नेटवर्क से कनेक्ट किया। वहीं, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के जरिए गांवों को पक्की सड़कों के जरिए शहरों से जोड़ा गया. वाजपेयी सरकार के दोनों प्रोजेक्ट सफल रहे और देश को आर्थिक विकास में बड़ी मदद मिली।
  • अटल विहारी वाजपेयी व्यापार और उद्योग चलाने में सरकार की भूमिका कम करने के लिए प्रतिबद्ध थे। इसके लिए उन्होंने अलग से विनिवेश मंत्रालय का गठन किया। सबसे महत्वपूर्ण विनिवेश में भारत एल्युमिनियम कंपनी (BALCO) और हिंदुस्तान जिंक, इंडिया पेट्रोकेमिकल्स कॉरपोरेशन लिमिटेड और VSNL शामिल थे. वाजपेयी के इन फैसलों से भविष्य में सरकार की भूमिका तय हो गई। हालांकि, उनके इन फैसलों को लेकर उनकी सरकार की आलोचना भी हुई।
  • वाजपेयी सरकार ने राजकोषीय घाटे को कम करने के उद्देश्य से वित्तीय उत्तरदायित्व अधिनियम शुरू किया. इससे सार्वजनिक क्षेत्र की बचत को बढ़ावा मिला. इसका नतीजा यह रहा है कि पब्लिक सेक्टर सेविंग्स वित्त वर्ष 2000 में GDP के -0.8 फीसदी की तुलना में वित्त वर्ष 2005 में बढ़कर 2.3 फीसदी तक पहुंच गई.
  • वाजपेयी सरकार की नई टेलीकॉम पॉलिसी से भारत में टेलीकॉम क्रांति की शुरुआत हुई. इसमें उन्होंने टेलीकॉम कंपनियों के लिए एक तय लाइसेंस फीस हटाकर रेवन्यू शेयरिंग की व्यवस्था शुरू की. भारत संचार निगम लिमिटेड का गठन भी नीति निर्माण और सेवा के प्रावधान को अलग करने के लिए बनाया गया था. दूरसंचार विवाद निपटान अपीलीय प्राधिकरण के निर्माण ने सरकार के नियामक और विवाद निपटान की भूमिकाओं को भी अलग कर दिया. वाजपेयी की सरकार ने अंतरराष्ट्रीय टेलीफोनी में विदेश संचार निगम लिमिटेड के एकाधिकार को पूरी तरह खत्म कर दिया था. इससे भी भारतीय अर्थव्यवस्था को नई दिशा मिली।
  • 6 से 14 साल के बच्चों को मुफ्त प्राथमिक शिक्षा देने के लिए एक सामाजिक योजना की शुरूआत की गई। 2001 में वाजपेयी सरकार ने सर्व शिक्षा अभियान को लॉन्च किया. योजना लॉन्च होने के 4 सालों के अंदर ही स्कूल से बाहर रहने वाले बच्चों की संख्या में 60 फीसदी की गिरवाट देखने को मिली। यह भी देश की आर्थिक तरक्की के लिए बेहतर योजना साबित हुई।

भारत रत्न अटल के प्रेरक संदेश-
बंदूकें नहीं, केवल भाईचारा से ही समस्‍याओं का समाधान निकाला जा सकता है

मेरे लिए सत्‍ता कभी आकर्षण की चीज नहीं रही

यदि भारत सेक्‍युलर नहीं रहेगा तो वह भारत नहीं रहेगा. इसके सेकलुरिज्‍म को कोई चुनौती नहीं दे सकता

भारत के लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबी यह है कि हम हमेशा राष्‍ट्र को राजनीति से ऊपर रखते हैं

आप मुल्‍क बदल बदल सकते हैं, लेकिन पड़ोसी नहीं

हमारे परमाणु हथियार विशुद्ध रूप से किसी विरोधी की तरफ से परमाणु हमले के डर को खत्म करने के लिए हैं

मैं 1952 से चुनाव लड़ रहा हूं लेकिन किसी पर कीचड़ नहीं फेंका
लोगों के सशक्‍तीकरण से देश का सशक्‍तीकरण होता है. आर्थिक विकास से सशक्‍तीकरण होता है और उसके माध्‍यम से सामाजिक बदलाव होता है.

मैं पाकिस्‍तान के लोगों और हुक्‍मरानों से कहना चाहता हूं कि हम आपके साथ शांति और भाईचारा चाहते हैं ताकि हम साथ मिलकर दक्षिण एशिया की तकदीर बदल सकें
विकास के लिए शांति जरूरी है   

जब अटल को पाकर पुरस्कार भी हुए गौरवान्वित
सन 2015 में ही उन्‍हें भारत के सर्वोच्‍च नागरिक सम्‍मान भारत रत्‍न से सम्‍मानित किया जा चुका है।
2015 में उन्‍हें बांग्‍लादेश सरकार ने फ्रेंड्स ऑफ बांग्लादेश लिबरेशन वार अवॉर्ड से नवाजा था। यह अवार्ड उन्‍हें सन 1971 में पाकिस्‍तान से स्‍वतंत्रता प्राप्‍त करने में बांग्‍लादेश की मदद करने के लिए दिया गया था। उस वक्‍त वह लोकसभा के सदस्‍य थे।

  • पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को सन 2015 में मध्‍य प्रदेश के भोज मुक्‍त विद्यालय ने भी डी लिट की उपाधि दी थी। इसी साल इन्‍हें गोविंद वल्‍लभ पंत पुरस्‍कार से भी सम्‍मानित किया जा चुका है।
  • तीन बार प्रधानमंत्री रह चुके अटल जी को सन 1994 में श्रेष्‍ठ सांसद के पुरस्‍कार से भी सम्‍मानित किया जा चुका है।
  • सन 1994 में उन्‍हें लोकमान्‍य तिलक पुरस्‍कार प्राप्‍त हुआ था।
  • सन 1993 में कानपुर विश्‍वविद्यालय ने उन्‍हें डी लिट की उपाधि से सम्‍मानित किया।
  • 1992 में उन्‍हें पद्म विभूषण के नागरिक सम्‍मान से नवाजा गया था।

सियासत का एक साहित्य, राजनीति का अजातशत्रु, अब नहीं रहा हमारे बीच-
 

भारत का प्रदीप्त ताज गिरा,
थक कर बूढ़ा बाज हीरा।।


16 अगस्त 2018 को एक लम्बी बीमारी के बाद अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, दिल्ली में श्री वाजपेयी का बुधवार को 93 साल की उम्र में उनका निधन हो गया। पिछले दो महीने से वह गंभीर बीमारी की वजह से अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान दिल्ली में भर्ती थे। बुधवार को शाम पांच बज कर पांच मिनट पर उन्होंने अंतिम सांस ली। अटल बिहारी वाजपेयी की पहचान सिर्फ भारत के 11वें प्रधानमंत्री के तौर पर ही नहीं है, वह भारतीय राजनीति में अजातशत्रु की तरह थे। एक ऐसा नेता जिसका कोई शत्रु नहीं, कोई दुश्मन नहीं। इतिहास में वह अपनी छाप एक प्रखर राजनेता, कूटनीतिज्ञ, पत्रकार, कवि और एक उदार जननायक के तौर पर छोड़ गए हैं।

  ।।अटल थे अटल हैं अटल रहेंगे।।

2 Comments

  1. Krishna Singh Krishna Singh August 17, 2018

    Rajniti ke surveer …aur pratibha sampan aise vyaktitva ko kho kr aapar dukh ho rha hai bhagwan unki aatma ko santi pradan kre…!! Atal ji ki jivani sanghrsho se bhari hai jo kisi bhi byakti ke liye uske kusal margdarshan me sahayak hogi!!!

  2. Surendra Kumar Gupta Surendra Kumar Gupta August 18, 2018

    Very nice, better and comprehensive article on ATAL.

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