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आदिवासी आजकल आन्दोलित क्यों हैं !

विगत कुछ माहों से झारखंड, छत्तीसगढ़, राजस्थान एवं मध्यप्रदेश जैसे राज्यों से आदिवासियों के आन्दोलन की खबरें आ रही हैं। इस आन्दोलन को ‘पत्थलगड़ी‘ के नाम से जाना जा रहा है। दरअसल इस आन्दोलन के पीछे आदिवासियों का लगातार हो रहा शोषण एवं उन्हें संविधान प्रदत्त आधिकारों से वंचित करना है। इन प्रदेशों के अधिसूचित क्षेत्रों में भारतीय संविधान की पाँचवी अनुसूची में दर्ज पंचायतों के प्रावधान (अनुसूचित क्षेत्रो में विस्तार अधिनियम-1996) संविधान के अनुच्छेद 244(1) के तहत लागू हैं। इस कानून को आम बोलचाल की भाषा में ‘पेसा कानून‘ कहा जाता है। पाँचवी अनुसूची के क्षेत्रों में ग्राम सभाओं को विशेष अधिकार हैं। पाँचवी अनुसूची क्षेत्रों के विकास हेतु राज्यपाल को विषेष अधिकार दिये गये हैं, जिनका शायद ही कहीं पालन हो रहा है।
पेसा कानून देश के 10 राज्यों झारखंड, ओड़िसा, मध्यप्रदेष, छत्तीसगढ़, राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, आंध्रप्रदेश और तेलंगाना में प्रभावशील है। त्रासदी यह है कि कानून को प्रभावशाली हुए 20 वर्ष बीत जाने के बावजूद इसे किसी भी प्रदेश में ठीक से लागू नही किया गया है। मध्यप्रदेश ने बहुत देरी से जून 2015 में नियम तो बनाये हैं लेकिन इन पर अमल नहीं किया जा रहा है। 
हकीकत यह है कि आज आदिवासी समाज जागृत हो गया है। आदिवासियों ने अनेक प्रदेशों में संविधान की पाँचवी अनुसूची के प्रावधानों के तहत अपनी स्वायत ग्राम सभाएं गठित कर उसके सीमा क्षेत्र में पत्थर गाड़ दिये हैं, जिसे पत्थलगड़ी कहा जा रहा है। झारखंड़ के बाद आजकल यह आन्दोलन छत्तीसगढ़ में जोर-शोर से चल रहा है। विगत 28 अप्रैल को आदिवासी बाहुल्य जशपुर जिले के गाँव में पत्थलगड़ी के आयोजन के बाद फैली हिंसा के कारण ओएनजीसी के पूर्व अधिकारी जोसेफ तिग्गा और पूर्व आईएएस अधिकारी एच.पी.किंड़ो समेत 8 लोगों को गिरफ्तार किया गया है।
मध्यप्रदेश में भी पत्थलगडी आन्दोलन 17 जिलों तक फैल गया है। सिवनी, बालाघाट, मण्डला, डिन्डोरी एवं उमरिया जिले में यह आन्दोलन काफी तेजी से चल रहा है। इसके अतिरिक्त खरगौन, बड़वानी, धार, झाबुआ, अलिराजपुर, रतलाम, बैतूल, होंशंगाबाद, छिदवाड़ा, दमोह, अनुपपुर एवं शहड़ोल जिलो में भी काफी हलचल है। इन सभी जिलों में समानान्तर ग्राम सभाओं का गठन किया जा रहा है। पत्थलगड़ी आन्दोलन में आदिवासी एकता परिषद, जयस, गोंडवाना महासभा, आदिवासी समाज संगठन, आदिवासी एकता महासभा, श्रमिक आदिवासी संगठन एवं आदिवसी मुक्ति मोर्चा जैसे संगठन सक्रिय हैं।
इससे बड़ी विड़बना क्या होगी कि एक तरफ तो विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा आदिवासियों के संविधान प्रदत अधिकारों का हनन किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर जब कुछ संगठन आदिवासियों को उनके अधिकारों के प्रति जागृत कर रहे हैं, तब इन आन्दोलनों को कानून-व्यवस्था बिगाड़ने का नाम देकर दबाने का प्रयास किया जा रहा है। मध्यप्रदेश के सिवनी जिले में एक ओर जहां स्थानीय आदिवासियों के खिलाफ आधा दर्जन से ज्यादा एफआईआर दर्ज होने की जानकारी प्राप्त हो रही है वही सिवनी में ही झारखंड़ आदिवासी महासभा के महासचिव कृष्णा हसंदा के खिलाफ राष्ट्रद्रोह का मामला दर्ज होने की खबर है। मध्यप्रदेष एवं छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में, जहां निकट भविष्य में चुनाव होने वाले हैं, इसे राजनैतिक रंग देकर अपनी-अपनी रोटी सेकने का कुत्सित प्रयास किया जा रहा है। इस आन्दोलन को धर्मांतरण से जोड़कर भी देखा जा रहा है।
मेरे मतानुसार पत्थलगड़़ी आन्दोलन विशुद्ध् रुप से आदिवासी समाज के उन अधिकारों की लड़ाई है जिनसे अभी तक राज्य सरकारों ने अपने-अपने कारणों से इन्हें वंचित रखा है। मुझे तो यह भी लगता है कि राजनेता गरीबों विशेषकर आदिवासियों को उनके वाजिब हक देना ही नहीं चाहते हैं। आजादी के 70 वर्ष बाद भी आदिवासी समाज विकास की मुख्य धारा से कोसों दूर है। मध्यप्रदेश में 30 वर्ष तक एक वन अधिकारी के नाते मैंने आदिवासियों की र्दुदशा को बहुत नजदीक से देखा है। उन्हें न तो गुणवत्तापूर्वक शिक्षा उपलब्ध कराई जा रही है और न ही सस्ती एवं सुलभ चिकित्सा। साक्षरता के अभाव में आदिवासी क्षेत्रों में आबादी विस्फोट हो रहा है। रोजगार के उचित साधन उपलब्ध नही हैं। एक तरफ जहां देश में द्वितीय हरित क्रांति का दौर चल रहा है, वहीं आदिवासी क्षेत्रों में कृषि अभी भी अत्यंत पिछड़ी हुई है। इन जनजातियों में कुपोषण का स्तर बहुत ऊंचा है। मध्यप्रदेश के सहरिया, बेगा एवं भारिया जैसी जनजातियां अत्यंत दयनीय जीवन जीने को अभिषप्त हैं।
मैंने मध्यप्रदेश के अनेक आदिवासी जिलों में कार्य करते हुए यह भी महसूस किया है कि दुर्भाग्य से  आदिवासी समाज के ज्यादातर जन प्रतिनिधियों (पंचायती राज संस्थाओं के पदाधिकारी, विधायक, सांसद) को न तो पाँचवी अनुसूची की ठीक से जानकारी है और ना ही पेसा कानून की। अब वक्त आ गया है कि आदिवासी समाज के जन प्रतिनिधि इन प्रावधानों के प्रति पहले स्वयं जागरुक हों और फिर इन प्रावधानों को अपनी-अपनी सरकारों से लागू करवायें ताकि बरसों से उपेक्षित आदिवासी समाज विकास की मुख्य धारा में शामिल हो सके। अगर ऐसा नही हो सका तो मुझे डर है कि अच्छी मंशा से शुरु हुआ पत्थलगड़ी आन्दोलन कहीं अपने रास्ते से भटक न जावे।
                                                                                                                  (लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं।)
 
  • लेखक आजाद सिंह डबास, पूर्व आईएफएस व सिस्टम परिवर्तन अभियान के अध्यक्ष हैं।
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