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स्मृति: अजित जोगी का विवादों से चोली दामन का साथ

राम मोहन चौकसे।।

छत्तीसगढ़ के पहले मुख्यमंत्री अजीत जोगी का विवादों से चोली दामन का साथ रहा। विवादों ने मरते दम तक उनका पीछा नहीं छोड़ा।अजीत जोगी सिर्फ बेहतर राजनेता ही नही वरन बेहतर प्रशासनिक अधिकारी भी थे।
कई वर्षों तक भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) अधिकारी रहे अजित जोगी लम्बे समय तक इंदौर कलेक्टर रहे। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री स्व.अर्जुन सिंह के सबसे विश्वनीय रहे अजीत जोगी छत्तीसगढ़ बनने के पूर्व मप्र में अनेक जिम्मेदार विभागों के प्रमुख रहे।छत्तीसगढ़ बनने के पूर्व वहां बने कोडार बांध के निर्माण में हुए 250 करोड़ के घोटाले में अजीत जोगी का नाम उछला था। मप्र की राजनीति में चाणक्य कहे जाने वाले मुख्यमंत्री स्व.अर्जुन सिंह के खास सिपहसालार होने के कारण अजीत जोगी पर आंच भी नहीं आई। स्व. अर्जुन सिंह तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व.इंदिरा गांधी के करीब थे।
अजीत जोगी के राजनीति में प्रवेश का किस्सा भी जोरदार है। मालवा क्षेत्र के बड़नगर के कद्दावर नेता सवाई सिंह सिसोदिया के कारण स्व.अर्जुन सिंह मालवा में अपनी पैठ नहीं बना पाए रहे थे। स्व.अर्जुन सिंह ने इंदौर कलेक्टर रहे अजीत जोगी पर दांव आजमाया। उन्हें राजनीति में आने के लिए प्रेरित किया।अजीत जोगी को आईएएस से इस्तीफा दिलवाकर उन्हें राज्य सभा का सदस्य मनोनीत करवाया।
अजीत जोगी ने अपने प्रशासनिक काल में इंदौर की तवज्जो दी। कलेक्टर रहते हुए कार की जगह घोड़े की सवारी करने के शौक ने पूरे देश का ध्यान खींचा।घोड़े पर सवार होकर अजीत जोगी कानून व्यवस्था का व्यवहारिक परीक्षण करते थे। इंदौर कलेक्टर रहते हुए उनकी पुत्री की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत भी विवाद का विषय बनी। अपुष्ट खबर थी कि प्रेम प्रसंग के चलते उनकी पुत्री की मौत हुई। संदिग्ध मौत की अनेक बार जांच की मांग के बाद जांच नहीं हुई।अजीत जोगी की पुत्री को इंदौर में दफना दिया गया।
राजनीति में आने के बाद अजीत जोगी ने इसाई कार्ड का उपयोग करते हुए श्रीमती सोनिया गांधी के निज सचिव जार्ज से सम्बन्ध प्रगाढ़ किए और मध्य प्रदेश से अलग होकर बनने वाले छत्तीसगढ़ के पहले मुख्यमंत्री बनने का मार्ग प्रशस्त कर लिया। यह सन 2000 की बात है। कहा तो यह भी जाता है कि बाद में अजीत जोगी ने स्व.अर्जुन सिंह से भी दूरी बना ली।उस दौर में इंदिरा गांधी जी के करीबी रहे स्व.विद्याचरण शुक्ल भी मुख्यमंत्री पद के दावेदार थे।स्व.शुक्ल को अनुमान था कि अजीत जोगी को छग का पहला मुख्यमंत्री बनवाने में दिग्विजय सिंह की अहम भूमिका है। कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व के आदेश की शिरोधार्य करते हुए मप्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह, दिग्गज नेता गुलाम नबी आजाद,एक महिला नेत्री विद्याचरण शुक्ल को मनाने तथा अजीत जोगी को मुख्यमंत्री की शपथ दिलाने छत्तीसगढ़ पहुंचे।
तीनों नेताओं के विद्याचरण शुक्ल के बंगले पहुंचते ही वहां मौजूद हजार कार्यकर्ताओ की भीड़ ने गुलाम नबी आजाद,दिग्विजय सिंह की लात, घूंसों से पिटाई कर दी।दिग्विजय सिंह का चश्मा टूट गया। कुर्ता फट गया। गुलामनबी आजाद के गाल लाल हो गए।इन दिग्गज नेताओं की पिटाई के दरम्यान विद्याचरण शुक्ल बंगले से बाहर आए। मारपीट कर रहे कार्यकर्ताओं को भगाकर तीनों नेताओं को बंगले के अंदर ले गए। इस तरह छत्तीसगढ़ के पहले मुख्यमंत्री की शपथ की शुरुआत विवाद से हुई।
मुख्यमंत्री बनते ही अजीत जोगी ने अपनी पुत्री के शव को इंदौर से निकलवाकर छत्तीसगढ़ में नई कब्र बनाकर दफन करवाया।इस मामले की पूरे देश मे गूंज हुई। अजीत जोगी नहीं चाहते थे कि उनके जिंदा रहते पुत्री की संदिग्ध मौत की दोबारा जांच हो।अजीत जोगी की धर्मपत्नी डॉ रेणु जोगी शासकीय चिकित्सा अधिकारी रही है। डॉ रेणु जोगी ने भी नौकरी से त्यागपत्र देकर राजनीति में प्रवेश लिया। वर्तमान में डॉ रेणु जोगी करेगी रोड से विधायक हैं।
अजीत जोगी के साथ जाति का विवाद जिंदगी भर रहा। आदिवासी से धर्म परिवर्तन कर ईसाई धर्म अपनाने वाले अजीत जोगी सुरक्षित सीट से चुनाव लड़ते रहे।उनकी जाति को लेकर अदालत में वर्षों मुकदमा चला।अदालत में अजीत जोगी मुकदमा हार गए।जिस आदिवासी समाज के नाम का अजीत जोगी जिंदगी भर उपयोग करते रहे।उसी आदिवासी समाज की बडी पंचायत ने भी उन्हें अपने समाज का होने से मना कर दिया।
छत्तीसगढ़ में एक कद्दावर सरदार नेता की संदिग्ध मौत का मामला भी अजीत जोगी से जुड़ गया।यह मामला वर्षो चर्चा में रह। अजीत जोगी के पुत्र अमित जोगी को इस मामले में जेल भी जाना पड़ा। अजीत जोगी के जिंदगी का दुःखद पहलू यह रहा कि जिस कांग्रेस पार्टी के दम पर राजनीति की। उस कांग्रेस की विवाद के चलते छोड़ना पड़ा।

(लेखक शासन से मान्यता प्राप्त अधिमान्य व वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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