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बॉयज और गर्ल्स लॉकर रूम: जिम्मेदार कौन?

हमारे देश के पारिवारिक ढाँचे में एक बड़ी समस्या यह है कि यहाँ कथनी और करनी में कई घरों में बहुत फर्क मिलेगा। किसी भी परिवार से आज के समय में पूछ लीजिए क्या वह अपने बच्चों के दोस्त हैं? क्या वह उसके दूसरों के प्रति आकर्षण के भाव को समझने को तैयार हैं? क्या वह उस पर विश्वास करते हैं कि अपने साथ होने वाले हर बात या दुर्व्यवहार को बिना झिझक शेयर कर लें? जवाब मिलेगा हाँ, मगर यह झूठ है

स्मिता कुमारी।।

भारतीय समाज में सेक्स पर छुप-छुप कर बातें तो सभी करते हैं, लेकिन सेक्स एजुकेशन की बात करने पर ऐसे हिचकते हैं जैसे सेक्स का नाम ही पहली बार सुन रहे हों। बॉयज लॉकर रूम का चर्चा जब से हो रहा है चारो तरफ अलग-अलग बातें हो रही है। वहीं इस तरह के लॉकर रूम (चैट्स ग्रुप) के सामने आने के बाद कई लोग सेक्स एजुकेशन की बातें कर रहे हैं तो कई अभी भी विरोध कर रहे हैं।

इन बच्चों के चैट में अजूबा क्या है और क्यों है?
मनुष्य के शरीर का हॉरमोन एक उम्र में विकसित होता है, वह हार्मोन अपने विकास के अनुसार अपना कार्य करता है। मनुष्य के शरीर में पुरुषों में एंड्रोजन और स्त्रियों में एस्ट्रोजन नामक सेक्स हार्मोन होते हैं जो उसमें किशोरावस्था में विकसित होता है। अचानक से लड़कियों के स्तनों में उभार, प्राइवेट पार्ट में बाल आना, आवाज में बदलाव, लड़को के लिंग के आकार में बदलाव, लड़कियों में मासिक धर्म होना, लड़कों में वीर्य बनना, मन विचलित होना, कल्पनाशीलता भरी दुनियाँ में खो जाना और अचानक शरीर में होने वाले इन बदलाव से इनमें मानसिक और व्यवहारिक बदलाव भी होता है। इसमें कोई अजूबा नहीं है, यह एक सामान्य विकास है। मगर असामान्य है इस पर सही तरीके से परिवार में बातें ना करना और बच्चों का बॉयज लॉकर रूम या गर्ल्स लॉकर रूम बनाकर सेक्स को जानना और रेप की प्रवृत्ति को विकसित करना।

जब अचानक से शरीर में कोई बदलाव होता है, तब उसके पहलुओं को जानने की उत्सुकता होती है। किशोर और किशोरी अपने शारीरिक बदलाव और उसके अपने जीवन पर प्रभाव को जानना चाहते हैं। जब यह जानकारी उन्हें अपने परिवार से नहीं मिलता तब वह इसे अपने ही उम्र के दोस्तों के बीच शेयर करते हैं। चूँकि वह भी उसी उम्र से गुजर रहे होते हैं, इसलिए सब मिलकर इस पर चर्चा करना और इसे सर्च करना शुरू कर देते हैं। सर्च करने के दौरान उन्हें कई तरह के भ्रामक तथ्य मिलते हैं, जिनमें वह खुद को फिट करके देखना चाहते हैं। खुद को फिट करने के लिए उस कार्य को करते भी हैं, करने के बाद अपनी उस वाक्या को शेयर करने पुनः दोस्तों के पास जाते हैं जहाँ उनके इसी कार्य को बच्चे दिलचस्पी से सुनते हैं। इससे उनको उनका महत्व अपने दोस्तों के बीच बढ़ाने का मौका मिलता है। साथ ही कई बच्चे सिर्फ दोस्तों का साथ पाने के कारण इसमें उलझ जाते हैं और पीयर प्रेशर के दबाब के कारण अपने आप को उसी तरह का बना लेना चाहते हैं। इंटरनेट सर्चिंग के माध्यम से आजकल उन्हें कई तरह के अश्लील वीडियो देखने और पढ़ने को आसानी से मिल जाते हैं। इसमें कई वीडियो ऐसे भी होते हैं जो “इंसेस्ट” और गैंग रेप को बढ़ावा देते हैं। इस तरह की तमाम बातें शेयर करने और फिर खुद को उसमें फिट एवं प्रभावी साबित करने के चक्कर में बच्चे इन चीजों में उलझकर गलत कदम भी उठा लेते हैं। कई बार वह समझ जाते हैं कि यह सब गलत है मगर उनके पास उस भरोसेमंद व्यक्तियों की कमी लगती है जिसके सहारे वह बाहर निकलना चाहते हैं। बच्चे अपने अभिभावकों से इस पर बात नहीं कर पाते हैं और बाहरी व्यक्ति कहीं उनके साथ दुर्व्यवहार ना करें यह सोचकर वह उलझ जाते हैं।

यह बात हम सब जानते हैं कि जिस कार्य को करने के लिए किसी को रोका जाता है वह उसी कार्य की ओर पहले जाना चाहता है। हमारे देश के पारिवारिक ढाँचे में एक बड़ी समस्या यह है कि यहाँ कथनी और करनी में कई घरों में बहुत फर्क मिलेगा। किसी भी परिवार से आज के समय में पूछ लीजिए क्या वह अपने बच्चों के दोस्त हैं? क्या वह उसके दूसरों के प्रति आकर्षण के भाव को समझने को तैयार हैं? क्या वह उस पर विश्वास करते हैं कि अपने साथ होने वाले हर बात या दुर्व्यवहार को बिना झिझक शेयर कर लें? जवाब मिलेगा हाँ, मगर यह झूठ है। सच यह है कि यह सभी को लगता है कि वह अपने बच्चों के दोस्त हैं मगर करीब जाने पर महसूस होता है कि वह मात्र अभिभावक हैं, जो कभी खुलकर बात करते भी हैं तो उनका मकसद होता है अपने बच्चों का सीक्रेट्स जानना, सीक्रेट्स जानना तक तो फिर भी ठीक है मगर फिर पल भर में ही सवालों का ढेर पूछकर उसे बिना वजह खुद को बेगुनाह साबित करने को मजबूर करते हैं।

सड़क के किनारे कई दीवारों पर, रेलवे ट्रैक के इर्द-गिर्द दीवारों पर और रेलवे कंपार्टमेंट के टॉयलेट में, न्यूज पेपर में कई जगह बड़े-बड़े अक्षरों में गुप्त रोग, स्वप्नदोष, लिंग का आकार बढ़ाने, स्तनों को सुडौल बनाने के दवाओं और इनका इलाज कारने वालों का नंबर दिया रहता है। क्या किसी ने कभी इन चीजों को नहीं देखा? देखा तो इसका कितना विरोध किया? क्या यह वाक्य बच्चे नहीं पढ़ते? अगर पढ़ते हैं तो इन चीजों को जानने की भी इच्छा होती होगी, फिर किससे सवाल करें? क्या घर में, स्कूल में ऐसी बातों के प्रति जागरूकता फैलाई जाती है?

वहीं कई घरों में बच्चे काफी उम्र तक अभिभावकों के साथ सोते हैं या भाई-बहन को एक साथ काफी उम्र तक सुला दिया जाता है। यह स्थिति यहाँ भी बेहद खराब होती है। कई बार बच्चों के सवालों का अटपटा जबाब देकर उन्हें कन्फ्यूजन में छोड़ दिया जाता है। 6वीं कक्षा का एक बच्चा क्लास में हस्तमैथून करते पकड़ा गया, जब इस विषय पर परामर्श के दौरान बात हुई तब उसने बताया कि वह अपने अभिभावक को यह सब करते और सीडी देखते देखा था। 7वीं कक्षा की एक बच्ची अपनी क्लासमेट से अश्लील बातें करती थी। परामर्श के दौरान उसने बताया कि वह अपने घर में अपने अभिभावक को यह सब मोबाइल में देखते हुए देख चुकी है।

ऐसा कई केस है जिनमें यह सामने आया है कि घर के माहौल में बच्चे यह सब देखते और कई बार सीखते हैं, मगर वहाँ इस बात पर मार पड़ने या अन्य भय से यह बातें दोस्तों से शेयर करते हैं। फिर आजकल तो मोबाइल पर पढ़ने के बहाने कई चीजें आसानी से सर्च कर लेते हैं। बच्चे स्मार्टनेस के साथ उस सर्चिंग की हिस्ट्री को डिलीट भी कर देते हैं। फिल्मों में कई सिन अश्लीलता को दर्शाते हैं, कई डबल-मीनिंग वाले शब्दों का उपयोग डायलॉग्स में या गानों में हो रहा है। यह बच्चों को बेहतर शिक्षा और उनके बेहतर विकास से भटका कर उन्हें मानसिक रूप से सेक्स के प्रति बीमार बना रहा है। कई घरों में बच्चे “इंसेस्ट” के भी शिकार हैं।

इस समस्या से बचाने के लिए समाज के हर व्यक्ति को जिम्मेदारी लेनी पड़ेगी। कुछ जिम्मेदारियां इस प्रकार हो सकती है :-
बच्चों के बीच घर में संवाद स्थापित करना होगा। उन्हें विश्वास दिलाना होगा कि उनके साथ कुछ गलत हो रहा है तो वह खुलकर अपने भरोसेमंद अभिभावक को बता सकते हैं।

सेक्स एजुकेशन को बढ़ावा देना होगा। 2005 में एडोलसेंट एजुकेशन प्रोग्राम भारत सरकार द्वारा शुरू की गयी थी। अध्यापक, बच्चों के माता पिता व नीति निर्माताओं ने आपत्ति जताई। 2007 में यह प्रोग्राम प्रतिबंधित कर दी गयी थी। सिर्फ राजस्थान, गुजरात और केरल ने इसके बाद यौन शिक्षा की अलग संस्करण की स्थापना की।

सेक्स नहीं करने पर जोर देने की बजाय सुरक्षित सेक्स की बातें बतानी होगी, क्योंकि रोकने से इस तरह की घटना रुक जाती तो यह सब नहीं होता। उन्हें इसके दुष्परिणाम को भी धैर्यता के साथ बताना होगा।

साइबर क्राइम और इसके लिए बने सजा के कानूनी प्रावधान को भी बताना होगा।

उन्हें कैरियर की तरफ और उनके हॉबीज को एनकरेज करके उसे पूरा करने में ध्यान लगाकर इस तरह की गतिविधियों से ध्यान डाईबर्ट करना होगा।

उनके साथ अभिभावकों को इमोशनल बॉन्डिंग मजबूत करना होगा। बच्चों को बातचीत करते रहने का स्पेस देना होगा।

अभिभावकों को भी अपनी गतिविधियों पर ध्यान देना होगा।

नेट के अत्यधिक उपयोग के बजाय किताबों से पढ़ने पर जोर देना होगा।

रेपिस्टों को फाँसी देने से रेप की घटनाओं में कमी नहीं होगी, रेपिस्ट मानसिकता को खत्म करने पर जोर देना होगा।

बच्चों के व्यवहार में आये बदलाव पर उनके साथ सौम्यता, धैर्यता, संवेदनशीलता और अपनत्व के साथ बात करनी चाहिए।

संयमता की बातें सिर्फ बच्चों पर लागू नहीं किया जा सकता, अभिभावकों को भी अपने व्यवहार और रूटीन में बदलाव की जरूरत है। बच्चों के सामने गाली- गलौच करने, अश्लील टिप्पणी का उपयोग करने, अत्यधिक समय मोबाइल पर बिताने से बचना होगा। घर का माहौल बेहतर होगा तभी बच्चों का बेहतर विकास होगा तथा उसे गलत व्यवहार में लिप्त करने वाले बाह्य उदीपकों से रोकने की ओर ध्यान दिया जा सकेगा।

(लेखिका रिहैबिलिटेशन साकोलोजिस्ट हैं। लेख में व्यक्त विचार उनके निजी हैं।)
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