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आरोग्य सेतू एप…निगरानी की आशंका के साथ निजता के अधिकार का हनन !

सुमित कुमार।।

दुनिया भर में कई देशों ने कोरोना संक्रमण की रोकथाम और जागरूकता के लिए कोविड-19 कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग मोबाइल एप्लिकेशन लॉन्च किया है। इस तरह का मोबाइल एप्लिकेशन उपयोगकर्ताओं को यह पहचानने में मदद करता है कि उन्हें कोविड-19 संक्रमण का खतरा है या नहीं। यह कोरोनो वायरस और इसके लक्षणों से बचने के तरीकों सहित लोगों को महत्वपूर्ण जानकारी भी प्रदान करता है। वहीं पिछले महीने 2 अप्रैल को भारत सरकार ने कोविड-19 कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग मोबाइल एप्लिकेशन ‘आरोग्य सेतु एप’ लॉन्च किया था।

इसके साथ ही गृह मंत्रालय ने 1 मई, 2020 को आदेश जारी कर घोषणा किया है कि आरोग्य सेतू मोबाइल एप्लिकेशन, कोविड-19 संपर्क ट्रेसिंग एप सभी निजी और सार्वजनिक कर्मचारियों के लिए अनिवार्य होगा। हर संगठन का प्रमुख “कर्मचारियों के बीच एप के सौ प्रतिशत कवरेज (इनस्टॉलेशन)” को सुनिश्चित करने के लिए जिम्मेदार होगा। गृह मंत्रालय द्वारा 1 मई को दिया गया आदेश राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन अधिनियम (एनडीएमए) 2005 के तहत जारी किया गया है। आदेश के अनुसार स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा जिलों को लाल, हरे और नारंगी क्षेत्रों में विभाजित किया जाएगा। लाल और नारंगी क्षेत्रों के भीतर नियंत्रण क्षेत्र के रूप में सीमांकित क्षेत्रों(कंटेन्मेंट जोन) में स्थानीय अधिकारियों को “आरोग्य सेतु एप का सौ प्रतिशत कवरेज (इनस्टॉलेशन)” सुनिश्चित करना होगा।

दुनियाभर के साथ-साथ भारत में भी ऐसे एप्लिकेशन पर सवाल खड़ा किया जा रहा है। चिंता जताई जा रही है कि ऐसे मोबाइल एप्लिकेशन लोगों के निजता का हनन करेंगे। साथ ही सरकारें इसके माध्यम से नागरिकों पर निगरानी रख सकती है, ऐसे में नागरिकों के निजता के अधिकार का हनन भी हो सकता है। वहीं डिजिटल अधिकार संगठन इंटरनेट फ़्रीडम फ़ाउंडेशन ने एप को एक “प्राइवेसी माइनफ़ील्ड” अर्थात गोपनीयता सुरंग क्षेत्र कहा है, संगठन ने आगे कहा है कि “यह न्यूनतमकरण, सख्त उद्देश्य सीमा, पारदर्शिता और जवाबदेही के सिद्धांतों का पालन नहीं करता है”।

भारत क्वारंटीन के तहत लोगों की निगरानी करने, लॉकडाउन के दौरान सार्वजनिक वाहन और लोगों की आवाजाही पर नजर रखने, चेहरे की पहचान कैमरा, ड्रोन और अन्य टेक्नोलॉजी का उपयोग करने वाले देशों की बढ़ती सूची में से है। वहीं डिजिटल अधिकार विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि ऐसी तकनीकों का उपयोग निगरानी के जोखिम को बढ़ाता है, और स्थिति में ढील के बाद भी इनमें से कुछ का उपयोग जारी रह सकता है।

मीडिया रिपोर्टों की मानें तो एप जल्द ही डिफ़ॉल्ट रूप से सभी स्मार्टफ़ोन पर इंस्टॉल्ड किया जा सकता है। कोरोनो वायरस पर नज़र रखने के लिए ब्लूटूथ फोन एप्स ने मामूली शुरुआती परिणामों को देखा है, हालांकि अधिकतर देश ऐसे मोबाइल एप्लिकेशन को वापस ले रहे हैं। वहीं ऑस्ट्रेलिया ने भी कोविड-19 कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग मोबाइल एप्लिकेशन को गोपनीयता भंग होने की चिंता जताते हुए वापस ले लिया है। इसी महीने की शुरुआत में एक संयुक्त बयान में दुनिया भर के लगभग 600 वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं ने कहा कि जीपीएस आधारित कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग एप में “पर्याप्त सटीकता” का अभाव है और इस कारण लोगों की गोपनीयता खतरे में आ सकती है। इनमें से कुछ एप के माध्यम से सरकारी या निजी निगरानी को सक्षम किया जा रहा है।

वहीं सर्वोच्च न्यायालय के 2017 के निजता निर्णय में शीर्ष अदालत ने उल्लेख किया था कि निजता एक मौलिक अधिकार है, जबकि संविधान के तहत हमारा कोई भी अधिकार निरपेक्ष नहीं है। न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़, जो इस मामले में नौ न्यायाधीशों में से एक थे, ने कहा था कि डेंगू जैसे स्वास्थ्य महामारी के मामले में सरकार ऐसी स्थिति में हो सकती है जहाँ वे महामारी की निगरानी और प्रबंधन के लिए डेटा एकत्र करना चाहते हैं। न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने लिखा था, “ऐसे मामले में, सरकार को इसका इस्तेमाल करने के लिए डेटा का अनाउंसमेंट करना होगा।”

भारत की राजनितिक गलियारे में भी आरोग्य सेतु एप को लेकर निजता का प्रश्न उठने लगा है। एआईएमआईएम चीफ असदुद्दीन ओवैसी ने शनिवार को सबसे पहले आरोग्य सेतु एप को लेकर निजता का मुद्दा उठाया। ओवैसी ने बीते शनिवार को ट्वीट कर कहा कि, ”केंद्र सरकार कोरोना वायरस से ताली, थाली, बिजली और एक बहुत संदेहास्पद एप से लड़ रही है। अब दिल्ली के सुल्तान ने एक फरमान जारी किया है जिसमें लोगों के पास कोई विकल्प नहीं है। उन्हें अपना प्राइवेट डेटा सरकार (और जिसके साथ सरकार चाहे) के साथ जरूर शेयर करना है।’ इसके बाद कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भी आरोग्य सेतु एप पर डेटा सुरक्षा और निजता से जुड़े सवाल को खडा किया है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने शनिवार शाम को ट्वीट किया, ‘आरोग्य सेतु एप एक आधुनिक सर्विलांस सिस्टम है। कोई संस्थागत निगरानी नहीं है। इस एप के कारण कई प्रकार की सुरक्षा संबंधी प्रश्न खड़े हो रहे हैं। आज नई तकनीक हमें सुरक्षित रहने में मदद कर सकती है। लेकिन भय का लाभ उठाकर लोगों को उनकी अनुमति के बगैर ट्रेक नहीं किया जाना चाहिए।’

अब सवाल उठता है कि आरोग्य सेतु एप के माध्यम से कौन सा डेटा एकत्र किया जाएगा और इसे कब तक सरकार द्वारा संग्रहित किया जाएगा और इसका उपयोग किन कार्यों में किया जाएगा। ऐसे सवालों पर केंद्र सरकार की तरफ से अभी तक पर्याप्त जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई है। सरकार अभी तक ऐसी कोई गारंटी नहीं दे रही है कि कोरोना संक्रमण काल समाप्त होते ही या हालात सुधारते ही इस डेटा को नष्ट कर दिया जाएगा। हाँ कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी के दावे को जरूर झूठा बताया है। उन्होंने ट्वीट कर लिखा, ‘रोज एक झूठ। आरोग्य सेतु एक मजबूत साथी है जो लोगों की सुरक्षा कर रहा है। यह मजबूत डेटा सुरक्षा ढांचे से लैस है। जिन्होंने जीवन भर सर्विलांस किया है वो ये नहीं जानते कि कैसे तकनीक के सहारे लोगों का भला किया जा सकता है।’

देखा जाए तो इलेक्ट्रॉनिक सर्विलांस के जरिये एकत्रित किये जा रहे डेटा के प्रयोग में लाए जाने से निजता के अधिकार का हनन होने के साथ ही सर्वोच्च न्यायलय के आदेश का भी उल्लंघन होगा जिसमें निजता के अधिकार को संवैधानिक अधिकार बताया गया है। आरोग्य सेतु एप के बारे में सबसे ज़्यादा चिंताजनक तथ्य ये है कि सरकार स्वयं मरीज़ों और संभावित संक्रमित लोगों की संवेदनशील जानकारी मुहैया करा रही है। हर केस की जो विशेष जानकारी आरोग्य सेतु एप के माध्यम से प्रकाशित की जाती है जिससे कि कोविड-19 से बीमार व्यक्ति या क्वारन्टीन किये गए लोगों की पहचान आसानी से हो सकती है जिससे उनके निजता के अधिकार का हनन होता है। अभी यह सुनिश्चित नहीं है कि सरकार किस प्रकार और कब तक इस डेटा का उपयोग करेगी।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं। लेख में व्यक्त विचार उनके निजी हैं।)
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