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मिटाना होगा कोरोना वायरस के कारण उत्पन्न हो रहे भेदभाव का बच्चों के मानसिकता पर प्रभाव…

जिन पड़ोस के बच्चों के साथ कोरोना संक्रमण से प्रभावित व्यक्ति के बच्चे खेल रहे थे वही पड़ोसी अपने बच्चों में संक्रमित परिवार से दूरी बनाये रखने के लिए ‘फिजिकल डिस्टेंस’ का पाठ पढ़ाने की बजाय ‘सोशल और इमोशनल डिस्टेंस’ का पाठ पढ़ाने लग गए हैं। यह ध्यान रहे कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी ‘फिजिकल डिस्टेंस’ शब्द का उपयोग किया है ना कि ‘सोशल डिस्टेंस’ शब्द का। ऐसे में सवाल यह उठता है कि…

सुमित कुमार।।

कोरोना वायरस का प्रभाव शायद हमारे शरीर से मिट भी जाए मगर इससे उत्पन्न भेदभाव का प्रभाव बच्चों की मानसिकता पर से मिटाना बेहद ही जटिल होगा। यह भेदभाव वाइपर सर्प के दंश की तरह अपना जहर उगल रहा है। भारतीय समाज के लिए चिंताजनक स्थिति यह है कि हम इसके इलाज के तरफ बढ़ने की बजाय इस अनुमान में समय गंवा रहे हैं कि इसका जहर विनाशक है या नहीं।

जब से कोराना वायरस भारत में फैलना शुरू हुआ है तब से इसके प्रसार को लेकर अलग-अलग रूप में कभी धर्म के नाम पर, कभी जाति के नाम पर तो कभी आर्थिक स्थिति के नाम पर लगातार भ्रम फैलाया जा रहा है। इसके साथ ही लॉकडाउन कि स्थिति में बच्चों पर होने वाली हिंसा लगातार बढती जा रही है। जिससे बच्चों के सामने परिवार और उसके सदस्यों का स्वरुप घृणात्मक रूप से प्रदर्शित हुआ है। इस बीच महिलाओं पर बढती हिंसा ने परिवार के पुरुष रुपी बच्चों को पितृसत्ता का पाठ बखूबी पढ़ा दिया है। कोरोना ने सिर्फ शारीरिक रूप से क्षति पहुँचाने का काम नहीं किया है, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य की क्षति भी भरपूर किया है। जिस प्रकार कोरोना संक्रमण से पूरा विश्व प्रभावित हुआ है उसी प्रकार इस दौरान बढती हुई हिंसा, भेदभाव, नफरत से होने वाली मानसिक समस्याओं से भी पूरा विश्व प्रभावित है।

हम अगर भारत की बात करें तो कोरोना संक्रमण के कारण लॉकडाउन के दौरान चाल्ड हेल्पलाइन पर 8,000 से ज्यादा कॉल्स प्रतिदिन बच्चों पर हो रहे हिंसा की रिपोर्ट दर्ज कराने के लिए आ रही है, जोकि पूर्व के आकड़ों से दो गुना ज्यादा है। लगातार अलग-अलग क्षेत्रों से हिंसा की सूचनाएं प्राप्त हो रही है, जिनका प्रारंभिक असर दिखना शुरू भी हो चुका है। जिन परिवारों के सदस्य कोरोना से संक्रमित हैं उनके प्रति उनके आस-पास के लोगों में भेदभाव की भावना अत्यधिक बढ़ गई है। जिन पड़ोस के बच्चों के साथ कोरोना संक्रमण से प्रभावित व्यक्ति के बच्चे खेल रहे थे वही पड़ोसी अपने बच्चों में संक्रमित परिवार से दूरी बनाये रखने के लिए ‘फिजिकल डिस्टेंस’ का पाठ पढ़ाने की बजाय ‘सोशल और इमोशनल डिस्टेंस’ का पाठ पढ़ाने लग गए हैं। यह ध्यान रहे कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी ‘फिजिकल डिस्टेंस’ शब्द का उपयोग किया है ना कि ‘सोशल डिस्टेंस’ शब्द का।

ऐसे में सवाल यह उठता है कि जब कोरोना का असर ख़त्म हो जाएगा तो क्या यह बच्चे फिर एक साथ खेल पायेंगे? कोरोना संक्रमित परिवार के बच्चे क्वारंटीन के दौरान की मानसिक स्थिति को अपने पड़ोसी दोस्तों से भावनात्मक जुड़ाव के साथ साझा कर पायेंगे? या यह संक्रमण उनके जीवन पर कलंक की तरह थोप दिया जाएगा?

कुछ ही दिन पहले दिल्ली से पैदल मजदूर और उनके बच्चे अपने घर की ओर निकल पड़े थे। उत्तरप्रदेश की वह घटना जिसमें सड़क के किनारे उन सभी मजदूरों और उनके बीवी-बच्चों को बिठाकर जिस प्रकार से सेनेटाइज करने के नाम पर उनके शरीर पर कैमिकल का छिड़काव किया गया था, वास्तव में वह कैमिकल उनके शरीर पर नहीं बल्कि उनके आत्मा पर छिड़का गया था। क्या वह मजदूर और उनके बच्चे अपने साथ हुए इस बर्ताव को जीवन में कभी भूल पायेंगे? क्या उनकी पहचान की गोपनीयता कायम है? क्या उन बच्चों के आसपास के लोग या परिचित व्यक्ति इस बात से अनजान हैं कि उन बच्चों पर कैमिकल का छिड़काव किया गया है? क्या यह घटना उन्हें शुद्धतावादी मानसिकता की ओर नहीं धकेल देगा? क्या यह घटना उन बच्चों को उनके स्कूल में उनके साथ होने वाले भेदभाव को बढ़ाने में प्राभावी कारक नहीं होगा? क्या इस घटना से इन बच्चों का कोई घृणात्मक नामकरण होने का भय उत्पन्न नहीं होता? यह सवाल हमें गहराई से सोचने-समझने के लिए मजबूर करता है कि इस घटना की आलोचना हम जितना भी करें वह कम है। इस घटना के लिए सिर्फ माफ़ी मांग लेना इसका समाधान नहीं हो सकता। इसके लिए व्यापक रूप से समाज में उनके प्रति सामानुभूति, अपनत्व और संवेदनशीलता को बढ़ाने के लिए शासन, प्रशासन और समाज के हरएक व्यक्ति द्वारा कार्य करना होगा।

इसी प्रकार से पूरे देशभर में कोरोना से बचाव करने वाले डॉक्टर्स, पुलिस, सफाईकर्मी, मानसिक रोग विशेषज्ञ एवं अन्य स्वास्थ्य कर्मियों के प्रति भी सम्मान और आदर का व्यवहार अपनाने के बजाय घृणा, नफरत और दुर्व्यवहार की घटनाएं लगातार सामने आ रही है। चाहे वह इंदौर के मानसिक रोग विशेषज्ञ के साथ उनके पड़ोसियों द्वारा किए गए दुर्व्यवहार की घटना हो या मद्रास के डॉक्टर के मृत्यु के बाद उन्हें दफनाने के लिए कब्रिस्तान में दो गज जमीन ना देने की घटना हो। ये योद्धा देश और देशवासियों को बचाने के लिए खुद कोरोना से संक्रमित, तनाव और अवसाद से संक्रमित होने के भय को छोड़कर अपनी जान को जोखिम में डालकर दिन-रात कार्य कर रहे हैं। इस संक्रमण के भय और अवसाद को उनका परिवार भी झेल रहा है। ऐसे योद्धाओं को समाज में सम्मानित करने के बजाय उनके साथ दुर्व्यवहार और उन्हें अपमानित किया जा रहा है। इसमें कई योद्धा संविदाकर्मी हैं, जिनको अन्य किसी प्रकार से शासन और प्रशासन द्वारा कोई अतिरिक्त लाभ या सुविधा मुहैया कराने की सूचना अभी तक नहीं आई है। जो लाभ सरकार द्वारा इन योद्धाओं को दिया जा रहा है वह भी इस दौरान कोरोना संक्रमण से मृत्यु के बाद प्रदान की जायेगी, लेकिन जीवित स्थिति में उन्हें कोई लाभ या सम्मान देने कि सूचना नहीं आई है। इस स्थिति में उनके घर के सदस्य विशेषकर बच्चों पर इसका दुष्प्रभाव पड़ रहा है। ऐसे लोगों का अपमान और उनके साथ दुर्व्यवहार होना, आने वाली पीढ़ी में सेवा-भाव को कम करने की ओर धकेल रहा है।

इस प्रकार की घटनाएँ हमें वह भयावह मंजर की झलक दिखा रही है कि कोरोना संक्रमण के प्रभाव से मानसिक और शारीरिक रूप से इलाज उपलब्ध कराने वाले विशेषज्ञ या दिन-रात ड्यूटी में तैनात पुलिसकर्मी के परिवार या बच्चे कोरोना संक्रमण काल के बाद क्या अपने परिवार द्वारा देशहित में प्रदान की गई सेवाओं को लेकर गौरवान्वित महसूस करेंगे? क्या उनके परिवार या बच्चों को भेदभाव की घटनाएं उनलोगों के प्रति घृणा के भाव नहीं पैदा करेंगे जिनके लिए उनके परिवार के सदस्य लगातार अपनी सेवा दे रहे हैं। बच्चों के मन में बैठ रहे इस घृणा, भेदभाव का जिम्मेदार कौन होगा? क्या सिर्फ कोरोना से निजात पा लेना इस भेदभाव रुपी जहर को मिटा पाएगा? बच्चों की कोमल मन को पुनः प्रेम से भरना, सेवा-भाव से भरना और विभिन्नता में एकता की भावना को मजबूत करना बेहद ही चुनौतीपूर्ण होगा।

यह ऐसा वक्त है जब सिर्फ भारत ही नहीं पूरी दुनियाँ भी मानसिक स्वास्थ्य के प्रति सोचने को मजबूर हो गई है। आने वाली पीढ़ी को मानसिक रूप से अगर विक्षिप्त होने से बचाना है तो हमें डटकर खड़ा होना होगा जातिवादी, धर्मवादी, आर्थिक असमानताओं पर फैलने वाले भेदभाव के खिलाफ। हमें खड़ा होना होगा कोरोना संक्रमित और इस संक्रमण के शारीरिक और मानसिक दुष्प्रभाव को रोकने में लगे योद्धाओं के लिए समाज में समान एवं सम्मानजनक स्थिति बनाये रखने के लिए। शासन और प्रशासन द्वारा इसके प्रति जागरूकता के लिए अगर अभी से कार्य नहीं किया गया तो यह भेदभाव, घृणा या नफरत कोरोना संक्रमण से भी ज्यादा घातक सिद्ध होगा…!

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं। लेख में व्यक्त विचार उनके निजी हैं।)

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