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अमेरिका के विश्व स्वास्थ्य संगठन की फंडिंग रोकने पर विश्व की राजनीति गरमाई…

सुमित कुमार।।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने प्रशासन को कोरोनो वायरस महामारी से निपटने के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) को अमेरिका द्वारा दी जाने वाली फंडिंग को अस्थायी रूप से रोकने का निर्देश दिया है। मंगलवार को कोविड-19 संकट पर अपने दैनिक ब्रीफिंग के दौरान, अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने कहा कि वह विश्व स्वास्थ्य संगठन के लिए 60 से 90 दिनों के लिए अमेरिकी फंडिंग को रोक रहे हैं, क्योंकि उनके प्रशासन ने कोरोना वायरस महामारी से निपटने की WHO के कार्य की समीक्षा की है। ट्रम्प ने विश्व स्वास्थ्य संगठन पर आरोप लगाते हुए कहा कि विश्व स्वास्थ्य संगठन कोरोना वाइरस महामारी से निपटने के लिए बेहद ही धीमा कार्य कर रहा है, और इस विश्व महामारी के समय में संगठन की कार्यप्रणाली “चीन केंद्रित” रहा है।

वहीं विश्व स्वास्थ्य संगठन के प्रमुख टेड्रोस अदनोम घेब्रेयसस ने जिनेवा में एक संवाददाता सम्मेलन में कहा कि “उन्हें ट्रम्प के फैसले पर पछतावा है, यह हम सभी के लिए एक समान खतरे के खिलाफ हमारे आम संघर्ष में एकजुट होने का समय है। जब हम विभाजित होते हैं, तो कोरोनो वायरस हमारे बीच के विभाजन का शोषण करता है। WHO ने फंडिंग गैप के प्रभाव की समीक्षा की है और अपना काम “बिना किसी डर या पक्ष के” जारी रखा है।“

अमेरिका के इस कदम की विश्व के राजनेताओं द्वारा आलोचना शुरू हो गई है। संयुक्त राष्ट्र के प्रमुख एंटोनियो गुटेरेस ट्रम्प के द्वारा उठाये गए इस कदम के बारे में एक बयान में कहा है कि “कोविड -19 के खिलाफ वैश्विक लड़ाई में विश्व स्वास्थ्य संगठन के लिए वित्त पोषण में कटौती नहीं करना समय की आवश्यकता है। यह मेरा विश्वास है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन का समर्थन किया जाना चाहिए, क्योंकि यह कोविड -19 के खिलाफ युद्ध जीतने में दुनिया के प्रयासों के लिए बिल्कुल महत्वपूर्ण है।”

अमेरिका के बाद सबसे ज्यादा विश्व स्वास्थ्य संगठन को फंडिंग, बिल एंड मेलिंडा गेट्स फॉउंडेशन करती है। बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन के संस्थापक बिल गेट्स ने विश्व स्वास्थ्य संगठन को अमेरिकी फंडिंग रोकने के लिए डोनाल्ड ट्रम्प की निंदा की है। बिल गेट्स ने ट्वीट कर कहा है कि “विश्व स्वास्थ्य संकट के दौरान WHO की फंडिंग रोकना उतना ही खतरनाक है जितना कि यह लग रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन का काम कोविड -19 के प्रसार को धीमा कर रहा है और अगर उस काम को रोक दिया जाता है तो कोई अन्य संगठन उनकी जगह नहीं ले सकता है। दुनिया को अब पहले से कहीं ज्यादा WHO की जरूरत है।”

विश्व स्वास्थ्य संगठन को फंडिंग करने के मामले में ब्रिटेन तीसरे नंबर पर है। अमेरिका द्वारा विश्व स्वास्थ्य संगठन की फंडिंग रोकने के निर्णय पर ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन द गार्डियन से कहते हैं, “हमारी स्थिति यह है कि WHO को धन देने से रोकने के लिए यूके की कोई योजना नहीं है, जिसकी वैश्विक स्वास्थ्य को नेतृत्व करने में महत्वपूर्ण भूमिका है। कोरोनावायरस एक वैश्विक चुनौती है और यह आवश्यक है कि सभी देश इस साझा खतरे से निपटने के लिए मिलकर काम करें।” यह पूछे जाने पर कि क्या अमेरिकी राष्ट्रपति के इस कदम से आप निराश नहीं थे, इस पर बोरिस ने कहा, “मैं केवल यूके की स्थिति निर्धारित कर सकता हूं।”

वहीं अमेरिकी प्रतिनिधि सभा विदेश मामलों की समिति के अध्यक्ष एलियोट एंगल, ट्रम्प के इस फैसले की आलोचना करते हुए अपनी प्रेस विज्ञप्ति में कहते हैं, “इस बिगड़ते संकट के प्रत्येक बीतते दिन के साथ, राष्ट्रपति हमें अपनी राजनीतिक नाटक पुस्तिका दिखा रहे हैं, वह विश्व स्वास्थ्य संगठन को दोष दे रहे हैं, चीन को दोष दे रहे हैं, अपने राजनीतिक विरोधियों को दोष दे रहे हैं, अपने पूर्ववर्तियों को दोषी ठहरा रहे हैं – वह हर कुछ कर रहे हैं जिससे इस मुद्दे से अमेरिकियों का ध्यान भटक सके। इस प्रशासन ने इस संकट का दुरुपयोग किया है और अब हजारों अमेरिकी को जीवन के रूप में इसका भुगतान करना पड़ रहा है।”

अफ्रीकी संघ प्रमुख मौसा फाकी महामत ने ट्वीट कर अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प के इस निर्णय पर अफसोस जताते हुए कहा है कि, “यह निर्णय “गहरा अफसोसजनक” है, दुनिया को कोविड -19 महामारी के दौरान विश्व स्वास्थ्य संगठन की मदद करना एक “सामूहिक जिम्मेदारी” है। वहीं केंद्रीय अफ्रीकी गणराज्य के स्वास्थ्य मंत्री पियरे सोमसे ने कहा कि ट्रम्प का यह निर्णय एक खेदजनक निर्णय है, जिसका विश्व स्वास्थ्य संगठन के कामकाज और विश्व स्वास्थ्य पर हानिकारक प्रभाव पड़ेगा, क्योंकि विश्व स्वास्थ्य संगठन स्वास्थ्य क्षेत्र में कई देशों का समर्थन करता है।

रूसी उप विदेश मंत्री सर्गेई रयाबकोव ने अमेरिका के इस फैसले की आलोचना करते हुए रसियन न्यूज एजेंसी टास से कहा है कि, “हम वॉशिंगटन द्वारा कल की घोषणा को विश्व स्वास्थ्य संगठन की फ्रीजिंग फंडिंग के रूप में देखते हैं। यह अमेरिकी अधिकारियों के लिए बहुत ही स्वार्थी दृष्टिकोण का संकेत है।”

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं व लेख व्यक्त विचार उनके निजी हैं।)
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