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ठहर गई याद….

स्मृति शेषः उषा गांगुली

विनय उपाध्याय।।

पंछी उड़ गया… शाख हिलती रही… फूल मुरझा गया… ख़ुश्बू बहती रही…। कला की क़ायनात में इंसानी जज़्बातों के बेशुमार रंग भरने वाली उषा गांगुली अब भीनी-सी महक के बीच ठहर गयी याद है। जीवन के रंगमंच पर आखिरी सांस भरते हुए उन्होंने इस दुनिया-ए-फ़ानी को अलविदा कह दिया है।

महामारी के इस संत्रास भरे समय में उषाजी का निधन हिन्दी के रंगमहल की एक मेहराब का ज़मींदोज़ हो जाना है। यकीनन, औरत की आवाज़ को अपने दर्जनों नाटकों में बुलंद करने वाली एक ज़ांबाज किरदार को हिन्दुस्तान ने खो दिया है।

Remembering Usha Ganguly and her contribution to the world of theatre.
Renowned theatre personality Usha Ganguly was fondly remembered by senior journalist and art critic Vinay Upadhyay on her demise.

…..स्वाधीन चेतना, जहाँ तयशुदा दायरों और साँचों से बाहर निकलकर अपनी चाहत की दुनिया के द्वार खोले जा सकें…। सपनों और कल्पनाओं के इन्द्रधनुषी रंगों की सोहबत में एक ऐसे सफ़र पर चल पड़ने का जतन हो जिसकी मंज़िलों पर खुद के हस्ताक्षर शाया हों…। उषा गांगुली की कला यात्रा का सच यही था। हमारे वक्ती दौर की एक ऐसी विलक्षण वामा, जिसकी रचनात्मक अभिव्यक्ति में संघर्ष, सुख और आनंद रंगमंच की चैखट पर जाकर जीवन की सार्थकता तलाशते रहे। राजस्थान, उत्तरप्रदेश और बंगाल की आबोहवा का असर उन पर कुछ ऐसा रहा कि नाटक के किताबी सिद्धांतों और कथित रंग-गुरूओं की शरण में जाए बगैर उषा का हुनर अपने संचित संस्कारों और कोशिशों के बीच सँवरता रहा। ‘मृच्छकटिकम्’ से ‘मानसी’ और ‘अन्तर्यात्रा’ तक कमोबेश पाँच दशकों में फैला उषा गांगुली का रंगकर्म ‘वसंत सेना’ के श्रृंगारिक अभिनय से लेकर ‘रूदाली’ और ‘चंडालिका’ के विद्रोही स्वरों से बहुत आगे निर्देषकीय कौशल की श्रेष्ठता साबित करता रहा। नाट्य आलेख और अनुवादों की लंबी फेहरिस्त उनके बौद्धिक श्रम और रंग निष्ठा को उजागर करती रही। इसी बीच कोशिशों के पाँव सम्मान और शोहरत के शिखरों तक जा पहुँचे। केन्द्रीय संगीत नाटक अकादेमी दिल्ली का पुरस्कार और भोपाल की रवीन्द्रनाथ टैगोर युनिव्हर्सिटी द्वारा डी.लिट की मानद उपाधि का सम्मान उनकी क़ामयाबी पर कुछ ऐसी मोहरें थीं। दिलचस्प यह कि हिन्दी रंगकर्म की मषाल उन्होंने सत्तर पार की उम्र में भी रौशन रखी। ‘रंगकर्मी’ नाम से कला का कुटुंब कोलकाता में उनकी विरासत के भविष्य का विश्वास बनकर उभरा। हार न मानकर, नई रार ठानकर उषा का कारवाँ बदस्तूर जारी रहा। सिने संसार ने भी उन्हें आवाज़ें लगाई, उषाजी ने उन्हें अनसुना भी नहीं किया लेकिन जो और जितना किया अपनी शर्तों पर किया। गाथा, पार, और रेनकोट जैसी फिल्मों से जुड़ते हुए भी वे रंगमंच की चौखट पर अपने कदम साधे रहीं।
भोपाल से उनकी गहरी सांस्कृतिक सोहबत रही। यहाँ की रंग बिरादरी से लेकर साहित्यिक-शैक्षणिक और कई सामाजिक शख्सियतों और संगठनों से उनका दोस्ताना नाता रहा। गये बरस नवंबर में हुआ साहित्य और कलाओं का अंतर्राष्ट्रीय महोत्सव ‘विश्वरंग’ उनकी भोपाल यात्रा का अंतिम प्रयोजन था। इस समारोह में उन्होंने ‘रंगमंच का नेपथ्य’ विषय पर संवाद किया था। भारत भवन, म.प्र. नाट्य विद्यालय, जनजातीय संग्रहालय तथा टैगोर विश्व कला संस्कृति केन्द्र के आमंत्रण पर वे राजधानी आती रहीं। टैगोर की जयंती पर आयोजित ‘प्रणति पर्व’ में वे टैगोर के नाट्य अवदान पर व्याख्यान देने और ‘गीतांजलि’ नृत्य नाटिका का अवलोकन करने विशेष रूप से उपस्थित रहीं। रंगकर्मी के.जी. त्रिवेदी ने जब महाश्वेता देवी की कृति ‘रूदाली’ के उषा गांगुली द्वारा हिन्दी में रूपांतरित नाटक का मंचन ‘त्रिकर्षी’ के लिए किया तो उषाजी इसके प्रभावी मंचन की मन-भर प्रशंसा करती रहीं। कालिदास के ‘मेघदूतम’ को जब मंच पर उतारने की बाद आई तो उन्होंने भोपाल से संस्कृत की आचार्य संगीता गुंदेचा को सहयोग के लिए पुकारा। रवीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय और हमारे संबद्ध संस्थानों टैगोर विश्व कला एवं संस्कृति केन्द्र, वनमाली सृजन पीठ, रंग संवाद तथा आईसेक्ट पब्लिकेशन एवं आईसेक्ट स्टुडियो का रचनात्मक सिलसिला बना और इस सक्रियता के चलते वे कई आयोजनों में कोलकाता से भोपाल और अन्य शहरों में शिरकत करने आती रहीं। कलागुरू रवीन्द्रनाथ टैगोर की सांस्कृतिक विरासत और उनके योगदान को लेकर हमारी अनेक भावी योजनाओं में उनकी सलाह लगातार बनी रहीं। वे इस इसरार से भरी रहीं कि भोपाल के हम कुछ संस्कृतिकर्मी उनकी अगुवाई में शांति निकेतन जाए। देश-दुनिया के हालात ठीक होते तो शायद इस पावस काल में यह मुमकिन भी होता। ….. मेरी पहली मुलाकात उषाजी से भारत भवन की अंतरंग शाला में हुई थी। वे नाट्य मंचन के लिए अपने समूह ‘रंगकर्मी’ के साथ थी और मैं बतौर उद्घोषक औपचारिक संवाद के लिए उनसे पेश आया। फिर इस प्रस्तुति की समीक्षा अखबार के लिए लिखी। ये वो प्रस्थान बिंदु था, जहां से उषा गांगुली और उनके काम को गहरे में देखने की ललक जागी। एक मुद्दत बाद जब टैगोर कला केन्द्र का ज़िम्मा संभालते हुए उन्हें भोपाल आने के लिए पुकारा तो उन्होंने मेरी आवाज़ को पहचानते हुए सहर्ष हामी भरी। वे तयशुदा प्रायोजन से आई और फिर लगातार आती रही। स्नेह और अपनापे का यह तार कुछ ऐसे जुड़ा कि ’दीदी’ के संबोधन के साथ यह आपसदारी गहराती गई। मृत्यु से एक पखवाड़ा पहले ही उन्होंने अपने छोटे भाई को खोया। अवसाद में थी। फिक्र इस महामारी में उन्हें कलाकारों की भी रही।
उषाजी का मानना था कि थियेटर एक सामूहिक कला है। यह माध्यम न तो अकेले डायरेक्टर का और न एक्टर का है। वे कहती- ‘‘मैंने हमेशा नाटक को एक सामूहिक उर्जा के रूप में ही जिया और देखा।’’ पिछले दिनों एक लंबे साक्षात्कार में उन्होंने कहा था कि थियेटर ने मुझे विशाल सामाजिक सरोकार दिया। एक ऐसे व्यक्ति के रूप में मेरा निर्माण हुआ, जिसने जीवन को देखने का एक अलग नज़रिया पाया और मैं इस विराट दुनिया को बहुत पास से देख सकीं, ख़ासकर इस देश की औरत की रूह को छूने की मैंने कोशिश की। अपनी इसी ज़िद और जिज्ञासा के चलते उषाजी ने ज़ोहरा सहगल, सूरज बाई खांडेकर, केतुकी दत्ता और सावित्री जैसी ज़ुनूनी कलाकारों के सपनों और दुश्वारियों को नज़दीक जाकर देखा-पढ़ा और ‘भारतीय रंग शिखर की महिलाएं’ नाम से यह दस्तावेज़ पेश किए। यह शोध ग्रंथ बहुत चर्चा में आया और उषाजी इस विषय पर व्याख्यान के लिए भी देशभर में बुलाई जाती रहीं। वे बहुत संतोष से भर कर कहती कि वे एक ऐसे थियेटर को साकार करने में सफल रही जिसमें विदेशी नकल से परे उनके अपने देश की आत्मा का दर्शन हो। वे इस बात का भी सुख जताती कि उन्होंने सम्मानों और पुरस्कारों से जुड़ी सफलता की चिंता किए बगैर कुछ सार्थक करने की कोशिश की। एक सवाल के जवाब में उन्होंने कुछ ठहर कर कहा था- ‘‘मैं अब ज़िंदगी के उस पड़ाव पर हूँ जहाँ अब बहुत ज़्यादा दिन बाकी नहीं। आंख मूंदने के साथ मैं बहुत ही सुखी आत्मा की तरह इस (भुवन) संसार से विदा लूंगी।’’
उषा गांगुली जैसी उद्भट रंगकर्मी के जीवन और रंगमंच की दास्तान को हदों में बांधना उन्हें कम आंकना ही होगा। उन्होंने ज़िदगी का हर लम्हा बामकसद जिया। रंगभूमि पर उषा की बिछलती किरणों की निशानियाँ हमेशा उजली रहेंगी…आमीन।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व कला समीक्षक हैं। लेख उनके सोशल मीडिया पोस्ट से साभार।)
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