Press "Enter" to skip to content

श्रोता हुए भावुक…जब गीतकार कामिल ने कहा-तुम तो हो गए शहर में ही गुम…

-मप्र साहित्य सम्मेलन के कार्यक्रम ‘सुखनगोई’ में सुनाई नज़्म

-गीतकार इरशाद कामिल को जेएल वर्मा स्मृति साहित्य सम्मान

– प्रख्यात स्वतंत्रता सेनानी एवं साहित्यकार जेएल वर्मा की याद में यह पुरस्कार दिया गया
– इरशाद कामिल जब वी मेट, तमाशा, सुल्तान, रॉकस्टार जैसी फिल्मों के गाने लिख चुके हैं

सतीश चन्द यादव, भोपाल।।
मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल की रविवार की शाम साहित्य सुधि श्रोताओं के लिए बेहद खास रही। जहां बाहर हो रही बारिश फुहारों ने मौसम को सुहाना बना दिया तो वहीं श्यामला हिल्स स्थित राज्य संग्रहालय के सभागार में ‘सुखनगोई’ में प्रसिद्ध बॉलीवुड गीतकार इरशाद कामिल ने रुमानियत घोल दी।

प्रसिद्ध गीतकार और साहित्यकार इरशाद कामिल स्व. जेएल वर्मा स्मृति साहित्य सम्मान से इस अवसर पर नवाजा गया। उन्हें यह पुरस्कार बुंदेलखंड के प्रख्यात स्वतंत्रता सेनानी और साहित्यकार स्व. जेएल वर्मा की याद में दिया गया। कार्यक्रम ‘सुखनगोई’ का आयोजन मध्य प्रदेश साहित्य सम्मेलन के भोपाल इकाई द्वारा किया गया ।

‘निम्मो’ सुन श्रोता हुए भाव विभोर

गांव की गलियां पूछ रहीं हैं

कहां रहे तुम इतने दिन…

निम्मो की तो शादी हो गई

हार गई थी दिन गिन-गिन
बहुत देर तक रस्ता देखा ..

गांव को खुद पर हंसता देखा
उसे यकीं था लौटोगे तुम

तुम तो हो गए शहर में ही गुम..

इरशाद कामिल ने अपनी कई रचनाएं सुनाईं। उन्होंने अपनी नज़्म ‘निम्मो’ से यह पंक्तियां श्रोताओं को सुनाई। इसे श्रोताओं ने विशेष रूप से पसंद किया।

बता दें कि इरशाद की गिनती हिन्दी सिनेमा के प्रमुख गीतकारों में होती है। कामिल ने बॉलीवुड के कई बड़ी फिल्मों के गानों को लिखा। इनमें जब वी मेट, तमाशा, सुल्तान, रॉकस्टार जैसी फिल्में शामिल हैं। फिल्म जगत को दिए उल्लेखनीय योगदान के लिए उन्हें आइफा, जी सिने, फिल्मफेयर अवॉर्ड से भी सम्मानित किया जा चुका है।

इस कार्यक्रम में अन्य गणमान्य अतिथि मौजूद रहे। इनमें भोपाल की नुसरत मेहदी, मुंबई के संतोष सिंह, दिल्ली के संदीप शजर, ममता तिवारी आदि शामिल थे। इन्होंने भी अपनी रचनाएं पढ़ीं और दर्शकों को भावविभोर कर दिया। इसके साथ ही मप्र हिंदी साहित्य सम्मेलन भोपाल इकाई के अध्यक्ष अभिषेक और साहित्य मंत्री अनुराग ने अपनी रचनाएं पेश की।

और यूं जमता गया रंग…

कार्यक्रम में उपस्थित साहित्यकारों की रचनाओं ने श्रोताओं को बांधे रखा। इन नज़्मों ने सबसे अधिक सराहना बटोरी…

सिगरेट की तरह उसके मुंह से लगे रहने में बड़ा मजा आ रहा था
पर मुझे क्या पता था बुझदिल बूट से राख मसल चला जाएगा।।
फजा में फैली हुई तीरगी में शामिल हूं,

सुखते सब मैं तेरी मैं तेरी खामोशी में शामिल हूं
यहीं नहीं के जबाने हुई हैं जहरीली,

मैं इनके जेहन की आलूदगी में शामिल हूं…

नुसरत मेहदी

तुझसे मिलता हूं तो कुछ देर खुशी रहती है
फिर बहुत देर आंखों में नमी रहती है…

संतोष सिंह

आप आए यहां रौशनी हो गई,

सर्द सी शायरी गुनगुनी हो गई
थी अमावश के अधियार सी जिंदगी,

छू लिया आप ने चांदनी हो गई..

संदीप शजर

लफ्जों के जाम हैं और रंगीनियां भी हैं,

कभी तुम महफिल देखो अदीबों की
निगाहों में नए अरमान मिलते हैं,

हम जब भी हंसी फरमान मिलते हैं
वफाएं खोजीं हो तो वहीं जाना,

जहां फालतू सामान मिलते हैं…

अभिषेक वर्मा

जलते घर को देखने वालों,

फूस का छप्पर आपका है
आपके पीछे तेज हवा है,

आगे मुकद्दर आपका है
उसके कत्ल पर मैं भी चुप था,

मेरा नंबर अब आया
मेरे कत्ल पर आप भी चुप हैं,

अगला नंबर आपका है…

बद्र वास्ती

जो मोहब्बत से पेश आते हैं,

उनको झुक कर सलाम करता हूं
रोज पढ़ता हूं मैं नमाज मगर,

राम का एहतराम करता हूं…

शाहजहां शाद

Be First to Comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *