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नर्मदा को राखी बांध फिर संघर्ष शुरू करेंगी मेधा पाटकर…दागे सवाल

• मप्र शासन नर्मदा घाटी के हजारों, घर, खेत, मंदिर, पेड़ों की—गांवों की हत्या पर चुप क्यों ?
• कहां हैं नर्मदा भक्त, साधु—संत ? क्या नर्मदा गुजरात की बंधक नदी या केन्द्र की संपत्ति है ?
• नर्मदा किनारे की आबादी, उपजाउ खेती, सैकड़ों मंदिर, कुछ मस्जिद, लाखों पेड़ देश की धरोहर नहीं ?

न्यूज़क्रस्ट नेटवर्क।।

नर्मदा घाटी के सरदार सरोवर डूब क्षेत्र में पीड़ितों के लिए सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता शनिवार को फिर सरकारों को अपने सवालों से घेरती नज़र आयीं। उन्होंने सरदार सरोवर के जलाशय में 133 मीटर तक पानी भरने के बाद विस्थापितों के दर्द सहित अन्य मुद्दों को प्रमुखता से उठाकर गुजरात एवं केंद्र सरकार पर निशाना साधा। मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल स्थित गांधी भवन में सरकार को सरदार सरोवर बांध मुद्दे पर घेरा। इस अवसर पर उन्होंने प्रदेश शासन से मिलकर अपनी बात रखने में पश्चात आंदोलन में लौटने बात भी कही।

आंदोलन की कहानी मेधा पाटकर की जुबानी

“सरदार सरोवर जलाशय में 133 मीटर से उपर जलस्तर पहुंचने से गांव—गांव की ‘हलाहल’ पद्धति से मुर्गे की करते हैं, वैसे ही हो रही हत्या, गुजरात और केन्द्र शासन की अमानवीय विकास की सोच एवं हठधर्मिता का नतीजा है। यह निश्चित ही ! पिछले पंद्रह सालों में मप्र की पूर्व सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में प्रस्तुत किए पुनर्वास पर ‘शून्य’ बैलेंस वाले आंकड़ों का खेल खेलने में शपथ पत्रों का जानबूझकर आधार लेकर, वैधता का दावा किया जा रहा है। आज की शासन ने भले ही 76 गांवों के 6000 परिवार, सूंपूर्ण जलसंचय के स्तर पर यानी 138.68 मीटर पर डूब में आएंगे, यह बयान दिया है, जो कि मुख्य सचिव के नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण को लिखे 27 मई 2019 के पत्र से तथा नर्मदा घाटी विकास मंत्री के बयानों से स्पष्ट है। लेकिन धरातल की हकीकत और ही गंभीर है और पूरी व्यवस्था की असंवेदना अतिगंभीर !
आज तक विस्थापितों की हजारों की संख्या, हजारों लंबित दावे, दुकानदारों, कुम्हारों, केवटों के अधिकार, पुनर्वास स्थालों के लिए भूअर्जन होकर नीति के खिलाफ भूमिहीन बनाये गये किसान, आदिवासी …… टापू बनने वाले भूअर्जित न हुए । क्षेत्र आदि की जांच ही जारी है | और तो और, सर्वोच्च अदालत के 2017 तक के आदेश या शिकायत निवारण प्राधिकरण के सैंकड़ों आदेशों का पालन भी बाकी है। मुख्य सचिव के ही पत्रानुसार 8500 परिवारों की अर्जियां प्रलंबित है | तो फिर पीढ़ियों से बसे इन परिवारों की गैरकानूनी डूब से हत्या क्यों और कैसे ?
सरदार सरोवर के विस्थापितों के गांव—मुहल्लों, जैसे कि चिखल्दा, निसरपुर, अवल्दा, भादल, जांगरवा आदि में डूब तथा कडमाल, खापरखेड़ा, एकलबारा, करोंदिया आदि गांवों के रास्ते डूब गए है और राजघाट, जांगरवाँ में एक मृत्यु सरदार सरोवर बांध के ही बलि हैं, मध्यप्रदेश की राजनीति और समाज के लिए यह शर्मजनक है। नर्मदा की भक्ति, सेवा, यात्राएं सब कोई कर चुके हैं। उससे कहीं वोट मिले, कहीं नोट, कहीं जीत कहीं हार | लेकिन नर्मदा की परवाह न होने से ही तेा इतना बड़ा विनाश और अघोरी विस्थापन होते हुए राजनीतिक शून्यता और विस्थापितों के हित में इच्छाशक्ति तथा राज्यहित संघर्ष की युक्ति दोनों का अभाव प्रखर रूप से दिखाई दे रहा है |
एक वक्त, जब निमाड़ बचाओ आंदोलन हुआ था, तब जनसंघ और कांग्रेस ने मिलकर सरदार सरोवर को मध्यप्रदेश के पूर्णत: अहित में घोषित किया था। आज हर उठाया मुद्दा साबित हो चुका है या हो रहा है। विस्थापितों की सूचियों में धांधली, भ्रष्टाचार के अलावा बांध का एकमात्र बिजली का लाभ नहीं मिल रहा है। आज तक राज्य के पूंजी निवेश में पचास प्रतिशत हिस्से पर विवाद कायम है और गुजरात में भरपूर पानी बरसने से न उसे लबालब भरे जलाशयों से पानी की जरूरत है न ही मप्रदेश को बिजली की। मध्यप्रदेश की बिजली उत्पादन क्षमता 21 हजार मेगावाट होते हुए इस वक्त की डिमांड तो मात्र 6800 मेगावाट है। फिर न्यूनतम बिजली के लाभ के नाम पर घाटी को विस्थापन के करंट का शॉक और मौन किसलिए ?
जाहिर है कि मध्यप्रदेश की पूर्व सरकार ने 2008 से 2010 के बीच बैकवाटर लेवल्स कम करने का अवैज्ञानिक खेल चलाया और सोलह हजार परिवारों को डूब से बाहर कर कागज पर धकेल दिया। उनके से बहुतांश आज डूब सामने होते हुए भविष्य को ही डूबने की संभावना भुगत रहे हैं। उसके बाद यानी 2017 में मप्र शासन ने लोकविरोधी भूमिका को लेकर जिनकी प्रकृति, संस्कृति के नाम पर सेवायात्रा के रूप में राजनीति की थी उन्हे ही बिना आधार मूल गांव में रहने के लिए दोषी ठहरा दिया था। सब लाभ पाकर भी भी केवल 138 मीटर डुबोये जाने से ही चार हजार परिवार गांवों में रह रहे हैं या दावा अधिकारियों का था। मप्र के उस समय के अधिकारी आज भी आंकड़ों का खेल खेलकर मुख्यमंत्री, मंत्री आयुक्त तक सही संख्या बचा हुआ कार्य आदि पर भ्रमित कर रहे हैं। अब गांव—गांव में जांच शुरू हो रही है। वह भी अधिकारों के अड़ंगे पार करके तो वह पूरी कब होगी? राजघाट में दो मृत्यु के बाद जांच हुई, गांवों में सूचियां टांगी गई उसमें गलतियों के अंबार लगा हुआ है। पात्रों को अपात्र अपात्रों केा पात्र के बीच आंदोलनकारी सच्चाई सामने ला रहे हैं। लेकिन मप्र के डूब में आ रहे वन की भरपाई पर निर्णय नहीं और जलस्तर तय करने वाला केद्रीय प्राधिकरण सक्षम नहीं निष्पक्ष नहीं। एनसीए में पति—पत्नी का राज, पुनर्वास उर्जा सिविल इंजीनियरिंग और पर्यावरण सभी विभागों के मुखिया कार्यपालक सदस्य की पत्नी सुमन सिन्हाजी अकेले कैसें मप्र शासन ही नही विरोधी दल बनकर राज्य की चिंता करने वाले भी क्या इसे मंजूर करेंगे। नर्मदा किस राज्य की जीवन रेखा है उसे बचाने, नियमित और नियंत्रित करने की जरूरत और गंभीरता समझेंगे।
आज राजपुर ब्लॉक में भमोरी, उपमरिया, साकड़, मदिल,जैसे गांव में जहां तीस हजार से अधिक जनसंख्या निवासरत है। आठ अगस्त से आज तक भूकंप के बढ़ते आवाज ही नहीं धके बैठ रहे हैं। रोज रात 13 बजे या ढाई बजे बच्चों के साथ बाहर आने, नींद खोने मजबूर हैं लोग। शालाओं में शिक्षक हैरान हैं बच्चों की सुरक्षा को लेकर। फिर भी जबलपुर से दो भूगर्भशास्त्री और एक भूकंपशास्त्री की टीम आकर गयी। जिन्होंने कहा हमें तो केवल देखने के लिए बुलाया गया है जांच के लिए नहीं। जब फिर जांच की मांग की जाएगी तब यंत्र—तंत्र के साथ आएंगे तब तक निष्कर्ष नहीं निकल सकता है। फिर भी कहते गए कि यह लोकलिस्ड टेप्ड एयर बाहर आने बेसाल्ट रॉक की दरारों में पानी घुसने से हो रहा है। यह असंभव है कि 1.6 साल्ट के भूकंप में इतने धमाके और आवाज, लेकिन जिलाधीश 1.46 का भूकंप जाहिर कर चुके है। कौन देख रहा है, कौन कहां कर रहा है मानीटरिंग।
इस स्थिति में नर्मदा घाटी जूझ रही है। स्थानीय अधिकारियों की मर्यादा ही नहीं, मध्यप्रदेश की राजनीतिक हार और केन्द्र गुजरात की हठधर्मिता सामने होते हुए 25 अगस्त के रोज दोपहर 12 बजे नर्मदा मैया को राखी में अपने से बांधकर घाटी के लोग मेधा पाटकर, देवराम कनोरा और कमला यादव जैसी जुझारू महिलाओं के साथ संघर्ष की राह पर नया कदम रखेंगे।
मध्यप्रदेश शासन अपने स्तर पर चुनौती, गंभीरता से लेगी या नहीं यह सवाल लेकर आज देवराम कनेरा, पेमाभाई भिलाला, मेधापाटकर एक छोट से दल के रूप में भोपाल में शासन स्तर पर अपनी बात रख कर लौटेंगे नर्मदा किनारे।”

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