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स्मृति शेष: मंगौड़े लाना नहीं भूलते थे बाबूलाल गौर…

देर रात 3 बजे ड्यूटी से लौटने के कारण मुझे सुबह देर से जागने की आदत पड़ गई थी। इस कारण श्रीगौर के वाहन प्रतिदिन मंदिर के बाहर खड़े हो जाते थे। उनके आने का संदेश मिलने के बाद लगभग पौन घण्टे दैनिक क्रिया,स्नान,पूजन में लगता था। इस दरम्यान श्री गौर अपने वाहन में बैठे रहते थे। उस चुनाव में परिणाम आने के पहले मैने अपने नाम से लिखी समीक्षा में बाबूलाल गौर की जीत सुनिश्चत शीर्षक से खबर प्रकाशित कर दी थी।मेरी बात सच साबित हुई।श्री गौर बड़े बहुमत से जीते।

राम मोहन चौकसे।।
बात अस्सी के दशक की है। उस दौर में मध्य प्रदेश के सर्वाधिक प्रसारित और प्रथम क्रम के दैनिक समाचार पत्र नवभारत के तत्कालीन सम्पादक स्वर्गीय ध्यानसिंह तोमर राजा द्वारा लिए गए लंबे साक्षात्कार के बाद दैनिक नवभारत में रिपोर्टर के पद पर काम करने की शुरुआत हुई थी।
सिटी रिपोर्टर रहते हुए एक माह ही बीता था कि मेरे प्रभारी मुख्य नगर संवाददाता श्रीधर जी का आदेश हुआ कि भाजपा विधायक बाबूलाल गौर के घर जाकर विशेष खबर की जानकारी लेकर आओ। बरखेड़ी मोहल्ले के उनके निजी मकान में श्री गौर से मेरी पहली मुलाकात थी। पहली मुलाकात में बाबूलाल गौर कुछ रहस्यमय लगे। बातचीत करने का विशेष अंदाज और कुटिल मुस्कान रहस्यमयी लगी। श्री गौर ने पेयजल समस्या संबंधी आंकड़े दिए। मैंने चाय पीने के बाद विदा ली। पेयजल के आंकड़ों पर आधारित मेरी पहली विशेष खबर छपी। इस खबर में बाबूलाल गौर का विशेष उल्लेख रहा।

पूर्व मुख्यमंत्री और लगभग 45 साल तक राजनीति की लंबी पारी खेलने वाले श्री गौर के वरिष्ठ पत्रकार विजयदत्त श्रीधर से बेहद आत्मीय और प्रगाढ़ सम्बन्ध हैं। श्रीधर जी को इन संबंधों का हर दिशा, हर मायने में बेहतर फायदा मिला। श्री गौर की श्रीधर जी से आत्मीत्यता का इस बात से अंदाज लगाया जा सकता है कि जहांगीराबाद स्थित नवभारत कार्यालय में रात्रि नौ बजे लगभग प्रतिदिन श्री गौर का आगमन होता था। श्री गौर हर दिन श्रीधरजी के लिए मंगौड़े ,रबड़ी,लडडू, मूंगफली,रेबड़ी अथवा मौसम के अनुरूप खाद्य सामग्री लाना नहीं भूलते थे। दो ढाई घण्टे की बैठक में राजनीति से लेकर दुनिया भर की बातें होती थी।

नवभारत के भोपाल संस्करण के समाचारों में जितना स्थान विधायक,मंत्री और मुख्यमंत्री के नाते बाबूलाल गौर को मिला। उतना स्थान किसी और राजनेता को नहीं मिला। नवभारत में हर दिन श्री गौर की छोटी अथवा बड़ी खबर जरूर प्रकाशित होती थी। श्री गौर अपनी हर खबर की कतरन कागज पर चिपकाकर बहुत करीने से निवास स्थित फाइलों में संभालकर रखते थे। हर फाइल विषयवार होती थी। भोपाल में पहले चार विधानसभा क्षेत्र होते थे। अब 7 विधानसभा क्षेत्र हैं। सम्भवतः 1988 की बात है। विधानसभा चुनाव में गोविंदपुरा विधानसभा क्षेत्र से श्री गौर को फिर टिकट मिला। नवभारत और सहयोगी संस्थान आंग्ल दैनिक एमपी क्रॉनिकल के पत्रकार मित्र सिटी रिपोर्टर को चारों विधानसभा क्षेत्र रिपोर्टिंग के लिए आवंटित कर दिए गए। चुनाव प्रचार से लेकर चुनाव परिणाम तक यह जिम्मेदारी सौंपी गई थी। श्रीधरजी की पसंद पर मुझे गोविंदपुरा क्षेत्र की जिम्मेदारी दी गई।
बाबूलाल गौर का प्रचार अभियान चरम पर था। मतदान के आठ दिन पूर्व श्री गौर ने इच्छा जताई कि नवभारत का रिपोर्टर उनका प्रचार अभियान प्रत्यक्ष देखे। श्रीधरजी ने श्रीगौर से कहा कि सिटी रिपोर्टर राम मोहन चौकसे के पास वाहन नहीं है। इसलिए प्रचार अभियान के लिए हर दिन घर से लेना और शाम चार बजे घर ही छोड़ना पड़ेगा। में उस समय रविशंकर शुक्ल मार्केट पांच नम्बर स्टॉप स्थित हनुमान मंदिर परिसर के टिन शेड वाले दो कमरे के मकान में किराए से रहता था। श्री गौर चुनाव प्रचार के अंतिम दौर में मुझे अपने वाहन से ले जाते और वापस छोड़ते थे। देर रात 3 बजे ड्यूटी से लौटने के कारण मुझे सुबह देर से जागने की आदत पड़ गई थी। इस कारण श्रीगौर के वाहन प्रतिदिन मंदिर के बाहर खड़े हो जाते थे। उनके आने का संदेश मिलने के बाद लगभग पौन घण्टे दैनिक क्रिया,स्नान,पूजन में लगता था। इस दरम्यान श्री गौर अपने वाहन में बैठे रहते थे। उस चुनाव में परिणाम आने के पहले मैने अपने नाम से लिखी समीक्षा में बाबूलाल गौर की जीत सुनिश्चत शीर्षक से खबर प्रकाशित कर दी थी।मेरी बात सच साबित हुई।श्री गौर बड़े बहुमत से जीते।
इस बात में दो मत नहीं कि बाबूलाल गौर राजनीति के अजात शत्रु हैं।वे राजनीति के संस्थान बन गए हैं। कपड़ामिल के श्रमिक से जीवन की शुरुआत कर प्रतिष्ठित वकील, विधायक, मंत्री,मुख्यमंत्री के पद तक आसीन होने में उनकी मेहनत,मिलनसारिता, विरोधी दलों में सर्वस्वीकार्य नेता की छवि,सामाजिक सरोकार,सतत सक्रियता का योगदान है।

प्रसंगवश: उस दौर में दैनिक नवभारत में नौकरी करना किसी भी व्यक्ति के लिए सरकारी नौकरी से कम नहीं था। नौकरी लगते ही मुझे प्रांतीय डेस्क प्रभारी स्वर्गीय जगत पाठक के निर्देशन में काम करने की जिम्मेदारी दी गई। प्रांतीय डेस्क में भोपाल संस्करण से जुड़े जिलों के समाचारों को संपादित करना था। नौकरी शुरू हुए तीन माह ही गुजरे थे कि इकलौते सिटी रिपोर्टर सुरेश गुप्ता की जनसंपर्क संचालनालय में सहायक जनसंपर्क अधिकारी के पद पर नौकरी लग गई। उस दौर में पद्मश्री विजय दत्त श्रीधर चीफ़ सिटी रिपोर्टर थे। सुरेश गुप्ता वर्तमान में जनसंपर्क संचालनालय में अपर संचालक हैं। सुरेश गुप्ता के नवभारत में नहीं रहने पर श्रीधरजी को बेहद कठिनाई होने लगी। एक सप्ताह के अंदर विजय दत्त श्रीधर ने स्व. जगत पाठक से अच्छा,मेहनती सिटी रिपोर्टर ढूंढने की गुजारिश की। स्व पाठक जी ने मेरा नाम सुझाया। श्रीधर जी ने इस शर्त पर अपने अधीन सिटी रिपोर्टर रखा कि काम संतोष जनक नहीं होने पर नौकरी नहीं रहेगी।

(लेखक मप्र के वरिष्ठ एवम शासन द्वारा अधिमान्य स्वतंत्र पत्रकार हैं)
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