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आगामी वर्षों में जनसहयोग प्राप्त मीडिया लेगा आकार: डॉ प्रबीर पुरकायस्थ

“भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल है जहां अखबार और पाठक बढ़ रहे हैं। किंतु उनमें से अधिकतम विज्ञापन से आय नहीं कर पा रहे हैं। लगभग 50 से 60 प्रतिशत विज्ञापन इंटरनेट आधारित हो गए हैं। मेरे मतानुसार आने वाले चार से पांच साल में जनता द्वारा सहयोग प्राप्त मीडिया आकार ले लेगा।”

सतीश चंद यादव।।
ज्ञान बांटने के लिए संचार जरूरी है। सामाजिक रूप से जीवन शुरू करने से ही लेखा-जोखा शुरू होता है। पहले लिखने की तकनीक जटिल होती थी। कृतियों को कॉपी करने में एक साल लगता था। लूट के माल में किताब का भी हिसाब रखा जाता था। लिखना पढ़ना कम और महंगा होता था। राजा-रजवाड़ों और रईसों के घर में ही लिखने पढ़ने का सामान होता था।यह कहना है लेखक व वरिष्ठ पत्रकार डॉ प्रबीर पुरकायस्थ का। उन्होंने बुधवार को माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में बुधवार को आयोजित विशेष व्याख्यान में ‘ट्रेंड्स इन जॉर्नलिज़्म एंड फ्यूचर ऑफ डिजिटल मीडिया’ विषय पर विद्यार्थियों को संबोधित किया।

उन्होंने प्रिंटिंग तकनीक के फायदे पर बोलते हुए कहा कि हमारे यहां पढ़ाई में जातिवाद भी एक समस्या थी। इस कारण यह तकनीक जनसंचार का प्रभावी माध्यम नहीं बन पाया। मौखिक रूप से पढ़ाने का फायदा हुआ। गीतबद्ध करने से वह याद करना आसान रहा है। प्रिंटिंग प्रेस आने से फायदा हुआ। इससे जनशिक्षा को विस्तार मिला। तकनीक संचार से जोड़कर इसे और प्रभावी बनाया गया है। पहले लिखे को कॉपी करने वक़्त कई बातें जोड़ दी जाती थीं। तकनीक के दौर में कॉपीराइट आ गया। कानून तलवार की पर चलता था। जो पढ़ा लिखा होता था वो ही कानून की विवेचना कर सकता था। तकरीबन 300-400 साल लगे लिपिबद्ध होने में। प्रिंटिंग के बाद कानून जनसुलभ हो गया।

इंटरनेट पर मल्टीब्रॉडकास्टिंग, पर प्लेटफार्म की जिम्मेदारी नहीं

डॉ पुरकायस्थ ने बताया कि जनसंचार के लिए साधन होना आवश्यक होता है। जो साधन सम्पन्न है वही खबर पहुँचा सकता है। टीवी और रेडियो के जरिए जनसंचार इसी तरह से हो रहा है। विज्ञापन आय का माध्यम बनाया गया। किंतु जनता को मूर्ख बनाने वाले विज्ञापनों से बचाने के लिए दुनियाभर में मूवमेंट चला। भ्रामक विज्ञापन से बचाने के लिए नियम भी बने। इंटरनेट के शुरुआत के दौर में मैंने कहा था कि इंटरनेट पर मल्टीब्राडकास्टिंग शुरू हो गयी। इससे साधन आधारित जनसंचार की अनिवार्यता समाप्त होने लगी। इंटरनेट द्वारा जनसंचार वायरलिटी पर आधारित है। यही फेकन्यूज़ के फैलने का कारण भी है। फेक न्यूज़ की जिम्मेदारी प्लेटफॉर्म की नहीं है। यह लिखने वाले की जिम्मेदारी है। यह प्लेटफॉर्म्स जानकारी देने में भी कम से कम छह महीने लगाता है।

बदला है चिंतन का विषय

जनसंचार ही जनउन्माद का भी कारण है। ख़बर संग्रह करने का माध्यम नेत्र ही हैं। यह पीढ़ी विसुअल्स से सीख रही है। हमारी पढ़कर सीख रही है। मानव सभ्यता की शुरुआत से लड़ना और भागना मूल प्रवृत्ति रही है। चलचित्र माध्यम से लोगों को उकसाना आसान होता जा रहा है। हमें चलचित्र माध्यम को नफरत फैलाने वाले से ज्यादा चिंतन के लिए प्रेरित करवाने वाला बनाना पड़ेगा। जब मैं पैदा हुआ था तब बेहतर समाज बनाने के लिए चिंतन था। अब चिंतन का विषय बदल गया है। युद्ध, पर्यावरण व अन्य के साथ फेकन्यूज़ और तकनीक आज की चिंता और चिंतन का विषय है।

अपने सम्बोधन के बाद डॉ पुरकायस्थ ने छात्रों के सवालों के जवाब भी दिए। पत्रकारिता विभाग के छात्र नितेश सिंह के मीडिया स्वायत्तता के सवाल पर जवाब देते हुए बताया कि भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल है जहां अखबार और पाठक बढ़ रहे हैं। किंतु उनमें से अधिकतम विज्ञापन से आय नहीं कर पा रहे है। लगभग 50 से 60 प्रतिशत विज्ञापन इंटरनेट आधारित हो रहे हैं। मेरे मतानुसार आने वाले चार से पांच साल में जनता द्वारा सहयोग प्राप्त मीडिया आकार ले लेगा। हम हाई एन्ड कंटेंट तैयार करते हैं। विश्व की तीन प्रमुख समाचार एजेंसिया पश्चिमी दृष्टि से समाचार देतीं हैं। समाचार पत्रों और समाचार ऐजेंसी द्वारा गलत खबर प्रसारित करने के सवाल पर उन्होंने बताया कि गलत खबर सरकार के लिए भी घातक है। सही खबर नहीं दबाई जा सकती है। वह किसी न किसी माध्यम से जनता तक पहुंच जाती है।

जब गांधी ने की टैगोर की मदद

विशेष व्याख्यान के अवसर पर रवींद्र नाथ टैगोर की पुण्यतिथि पर उन्हें याद किया गया। उनकी रचना गीतांजलि के वाचन के साथ प्रोफेसर अरुण कुमार त्रिपाठी ने टैगोर की प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला। उन्होंने महात्मा गांधी और टैगोर के मध्य संवाद के संस्मरणों को भी साझा किया। प्रो त्रिपाठी ने कहा कि काव्य का छाया काल गीतांजलि से प्रेरित है। निराला भी टैगोर से प्रेरित दिखते हैं। यह छायावाद का शताब्दी वर्ष है। जब शांति निकेतन चलाने के लिए टैगोर के पास धनाभाव हुआ तो गांधी जी ने उद्योगपति बिरला से कहकर आर्थिक मदद करवाई थी। सुभाषचन्द बोस से होने वाले मनमुटाव को भी टैगोर सुलझाते थे। डॉ त्रिपाठी ने कहा कि महापुरुषों का आपस में लड़ाना नहीं चाहिए। व्हाट्सएप विवि से बाहर आकर छात्रों को खुद सब देखना चाहिए, पढ़ना चाहिए। अब परहित की जगह परपीड़ा पहुंचाने का दौर चल पड़ा है।

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