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बाघ बचेंगे तो हम बचेंगे

  • पत्रकारिता विश्वविद्यालय में बाघ संरक्षण पर डॉक्यूमेंट्री का हुआ प्रदर्शन

  • वरिष्ठ पत्रकार ललित शास्त्री की डॉक्यूमेंट्री से विद्यार्थियों ने जाना जंगल, बाघ और मानव सभ्यता का अन्तर्सम्बन्ध

सतीश चंद यादव।।

बाघ हमारे जीवन का एक महत्वपूर्ण अंग हैं। वे जंगल के रक्षक हैं। उनका संरक्षण सामाजिक चेतना से ही संभव है। यह संदेश सोमवार को माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में विश्वविद्यालय में विश्व बाघ दिवस के अवसर पर आयोजित डॉक्यूमेंट्री प्रदर्शन में दिया गया।

डॉक्यूमेंटरी प्रदर्शन से पूर्व विश्विविद्यालय में एडजंक्ट प्रोफेसर अरुण कुमार त्रिपाठी ने कहा कि लोभ में मानव जाति सबसे आगे है। इसकी जमा करके विलासिता करने की आदत नाश करती है। विष्णु सहस्त्रनाम में प्रकृति के लिए व्यापक दृष्टि है। मैंने जनसत्ता के दिनों में कान्हा व बांधवगढ पर तकरीबन 25 खबरें लिखीं। इसमें पर्यटन के दौरान बाघों को दिखाने के कार्य में बाघों के प्रति अत्याचार भी देखा। कभी बाघों के शिकार को शौर्य और शौक का प्रतीक माना जाता था। चेतना जागृत हुई है। अब संरक्षण हो रहा है। स्थानीय समुदाय वन्य जीवों की ज्यादा बेहतर तरीके से सुरक्षा कर रहे हैं। कागजों पर बाघ नहीं बचेंगे। इसके लिये सामाजिक चेतना जरूरी है। फारेस्ट राइट एक्ट और टाइगर प्रोजेक्ट में संतुलन भी होना चाहिए।

डॉक्यूमेंट्री प्रदर्शन की सहयोगी संस्था ‘क्रू’ के संस्थापक व वरिष्ठ पत्रकार ललित शास्त्री ने बताया कि उन्होंने अपने पत्रकारिता के दिनों में संपादक से छुट्टी लेकर वन्य प्राणियों पर अध्ययन किया। अब वन क्षेत्र सिकुड़ता जा रहा है। आदिवासी क्षेत्रों में बढ़ती आबादी के हिसाब से दैनिक जीवन की आवश्यकता का संसाधन पर असर पड़ा है। उन्होंने प्रदर्शित फ़िल्म के बारे बताते हुए कहा कि सतना में एक बाघ को गोली मारने की खबर डॉक्यूमेंट्री की प्रेरणा मिली। इस घटना से मन व्यथित हो गया था। महाभारत में उल्लेखित श्लोक – निर्वनॊ वध्यते वयाघ्रॊ निर्व्याघ्रं छिद्यते वनम तस्माद वयाघ्रॊ वनं रक्षेद वनं वयाघ्रं च पालयेतमें भी बाघ को वन का संरक्षक भी बताया गया है। सरिस्का अभ्यारण्य में बाघों के ख़त्म होने की जानकारी भी वर्ष 1999 में क्रू ने अपनी शोध पत्रिका में ‘वैनिशिंग स्ट्राइप्स’ से किया था। इसके बाद इसे संज्ञान में लिया गया और बाघ संरक्षण के प्रयास तेज किये गए।

डॉक्यूमेंट्री प्रदर्शन के बाद विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कुलाधिसचिव श्रीकांत सिंह ने बाघ और जंगल के अंतर्संबंधों पर प्रकाश डाला। जंगलों के संरक्षण पर मनुष्य की भूमिका महत्वपूर्ण बताते हुये कहा कि जंगल और बाघ बचेंगे तो पृथ्वी पर जीवन बचेगा।

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