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हज़ारों अटकलों के बीच आज जुबान पर बस एक ही सवाल है। क्या मोदी लौट रहे है ?

टीवी देखने वाला देश का एक तबक़ा ये भी सोचता है कि मोदी १६-१७ घंटे काम करते हैं और परिवार ना होने के कारण वे बईमान नही हो सकते। उनकी बूढ़ी माँ ऑटो से चलती हैं और बड़े भाई राशन की दुकान चलाते हैं। मोदी सचमुच देश के ईमानदार चौकीदार है। ज़ाहिर है कुशल स्क्रिप्ट के ज़रिये गढ़ा गया ऐसा नैरेटिव, ऐसा प्रोजेक्शन और ऐसी इमेज आज देश में किसी और नेता को नसीब नही है। अमेरिका की नई डिजिटल भाषा में इसे “रेपुटेशन मैनेजमेंट” कहते हैं जिसे देश की मीडिया ने मोदी के लिए बखूबी रचा है।

दीपक शर्मा।।

न्यूज़ चैनल के ताजे ओपिनियन पोल देखें तो मतलब यही निकलता है कि कीचड में सना कमल फिर खिलने जा रहा है। यूँ तो कुछ पोल कहते है कि मोदी इस बार बहुमत नहीं जुटा पाएंगे पर बाद में एंकर समझाते हैं कि फिर भी सरकार, मोदीजी की ही बनने वाली है। यानी येन केन प्रकारेण मोदी, एनडीए के पक्ष में 272 का जादुई आंकड़ा जोड़ लेंगे….और एक बार फिर शपथ लेंगे।
ओपिनियन पोल की गिरती साख देखकर उनपर भरोसा नहीं किया जा सकता है। इसके कई कारण हैं। मसलन पीएम मोदी को यूपी और हाल के हारे तीन राज्यों में बेहद कड़ी चुनौती मिलने वाली है। यही नहीं, दक्षिण में मोदी और उनके सहयोगी दल दोनों कमज़ोर दिखाई पड़ रहे हैं। पूर्व और पूर्वोत्तर में भी बीजेपी कोई लहर बनाने में अब तक सफल नहीं दिख रही है। लेकिन इन नेगेटिव कारणों के बावजूद मोदी के पक्ष में “मेनस्ट्रीम ओपिनियन” का झुकाव दिखता है और ये झुकाव बीजेपी को आगे बढ़ने में गति दे सकता है।

क्या है “मेनस्ट्रीम ओपिनियन”, कितना अहम है और क्यों है उसका मोदी के प्रति झुकाव ?

लोकतंत्र के बड़े फैसलों को लेकर सबसे पहले फ्रांस में “मेनस्ट्रीम ओपिनियन” के स्विंग पर बहस छिड़ी । पहले “मेनस्ट्रीम ओपिनियन” का मतलब जान लें। मेनस्ट्रीम ओपिनियन, किसी विषय या विवाद या चुनाव पर किसी देश की आम सोच, आम राय है । हिंदी में आप इसे सीधे सीधे मुख्यधारा की सोच कह सकते है। ये ज़रूरी नहीं की मेनस्ट्रीम ओपिनियन, सीधे वोट में बदल जाती है पर वोट स्विंग में इसका सकारत्मक प्रभाव रहता है। फ्रेंच समाजशास्त्री मानते है कि मुख्यधारा की सोच पर सबसे ज्यादा असर मुख्यधारा की मीडिया का होता है। यानि किसी विषय पर जो देश के प्रमुख अख़बार और चैनल कह रहे हैं, कुछ वैसा ही उस देश में आम राय भी बनती जाती है। आज के दौर में मुख्यधारा की मीडिया का प्रभाव सोशल मीडिया पर भी खूब होता है। और ये दोनों मीडिया प्लेटफार्म मिलकर मुख्यधारा की सोच प्रभावित करते हैं।

भारत में मुख्यधारा की मीडिया ने कैसे गढ़ा मोदी को ?

अपने देश की मुख्यधारा मीडिया ने पिछले पांच साल में जिस तरह पीएम मोदी को एक सुपर लीडर के रूप में गढ़ा है उसका असर मुख्यधारा की सोच पर भी पड़ा है । ज़ी न्यूज़ में सुधीर चौधरी, रिपब्लिक टीवी में अर्नब गोस्वामी, टीवी 18 में अमीश देवगन या आजतक में श्वेता सिंह या रोहित सरदाना जैसे दर्ज़नो प्रमुख एंकर्स ने जिस तरह मोदी को अटल और इंदिरा से भी बेहतर बताया और हर दिन उनको बेहतर तरीके से प्रोजेक्ट किया उससे देश की मुख्यधारा की सोच पर असर पड़ा है। दैनिक जागरण और अमर उजाला जैसे अख़बारों ने भी मुख्यधारा की सोच को मोदी के पक्ष में झुकाने में अहम भूमिका निभाई है । सोशल मीडिया पर बीजेपी के हज़ारों ट्रोल और मुख्यधारा के मीडिया हैंडल्स से भी मोदी के सकारात्मक पक्ष को ही जनता के सामने परोसा गया है । इसका असर ये हुआ कि आज देश की मेनस्ट्रीम ओपिनियन में मोदी भले ही सुपर लीडर न हों पर बाकि सभी नेताओं से बेहतर माने जाते हैं। आम जनता और ख़ासकर निम्न मध्यम वर्ग कहीं ना कहीं ये मानता है कि मोदी मेहनतकश नेता हैं। वे भले ही कुछ मामलों में कामयाब नही हो सके पर कुछ तो कर रहे हैं। टीवी देखने वाला देश का एक तबक़ा ये भी सोचता है कि मोदी १६-१७ घंटे काम करते हैं और परिवार ना होने के कारण वे बईमान नही हो सकते। उनकी बूढ़ी माँ ऑटो से चलती हैं और बड़े भाई राशन की दुकान चलाते हैं। मोदी सचमुच देश के ईमानदार चौकीदार है। ज़ाहिर है कुशल स्क्रिप्ट के ज़रिये गढ़ा गया ऐसा नैरेटिव, ऐसा प्रोजेक्शन और ऐसी इमेज आज देश में किसी और नेता को नसीब नही है। अमेरिका की नई डिजिटल भाषा में इसे “रेपुटेशन मैनेजमेंट” कहते हैं जिसे देश की मीडिया ने मोदी के लिए बखूबी रचा है।

ग़ैर राजनैतिक और जातिगत/दलगत राजनीति से इतर एक अलग सोच

अगर उत्तर प्रदेश में यादव, जाटव और मुस्लिम समाज से इतर, गैर राजनैतिक समाज की आम राय जानने कि कोशिश जाएगी तो मेनस्ट्रीम ओपिनियन में मेनस्ट्रीम मीडिया का असर दिखेगा। दरअसल आम आदमी की राष्ट्रीय और अहम मुद्दों पर राय अक्सर मेनस्ट्रीम मीडिया की राय पर ही आधारित होती है। यानि जो टीवी पर दिखा जाएगा उसका अक्स कहीं ना कहीं एक तटस्थ मन पर उतरता जाएगा। इस दिशा में अख़बार और टीवी दोनो मिलकर क्रॉस प्लाट्फ़ोर्म इम्पैक्ट गढ़ते हैं। अगर दैनिक जागरण या ज़ी न्यूज़ में मोदी को सबसे सफल प्रधानमंत्री बताया जायेगा तो गैर राजनैतिक व्यक्ति मोदी के इस प्रोजेक्शन पर यकीन कर ही लेगा। और ये प्रोजेक्शन धीरे धीरे उस व्यक्ति की अपनी निजी राय में बदलेगा।
इस सूपर प्रोजेक्शन के दौर में सरकार की विफलताएँ जानबूझकर हाशिए पर धकेल दी जाती हैं। ज़ाहिर है जब बेरोज़गारी, स्मार्ट सिटी, डिजिटल इंडिया, मेक इन इंडिया, क्रोनी कैपिटलिज्म या भ्रष्टाचार पर नकेल जैसे ज्वलंत विषय मुख्यधारा की मीडिया के लेंस से बाहर होंगे तो मोदी के प्रति मेनस्ट्रीम ओपिनियन भी नेगेटिव नहीं हो सकेगा। मसलन अगर कोई ट्रेन दस घंटे लेट चल रही है तो गैर राजनैतिक (नॉन पोलटिकल/नॉन पॉलिटिकली एक्टिव ) यात्रियों की आम राय ये होगी कि ये ट्रेन, रेलवे के अयोग्य कर्मियों के कारण लेट हुई, इसमें मोदी सरकार का ज्यादा कसूर नहीं है। अलबत्ता मोदी को कुछ और मौका दिया जाए तो वे रेलवे के इन निकम्मे नौकरों को भी सुधार सकते हैं। इसी तरह नोटबंदी के नकारात्मक पहलू, मैनस्ट्रीम ओपिनियन के दायरे से प्राय दूर रहें और ये कहा गया कि सरकार ने नोटबंदी करके जनता को लाइन में तो लगवाया लेकिन भ्रष्ट लाला और थैलिशाहों को रीढ़ तोड़ दी।

प्रचंड प्रचार क्यों है सब पर भारी

प्रचार यूँ तो सभी राजनैतिक दल और सरकारें करती हैं। लेकिन प्रचंड प्रचार के तहत मुख्यधारा की मीडिया को एक सोची समझी रणनीति के जरिये प्रभावित करके मोदी-शाह की जोड़ी ने काफी पोलटिकल माइलेज हासिल की है। सरकार ने अपने अनुकूल मीडिया संस्थानों को लाइसेंस और विज्ञापन से लेकर विभिन्न मंत्रालयों में दबे पड़े काम जहाँ सहजता से कराये वहीँ सत्ता का विरोध करने वाली मीडिया को आयकर से लेकर हर सरकारी नियम, अधिनियम में उलझा दिया। मिसाल के तौर पर एनडीटीवी के मालिक प्रणय राय के खिलाफ हर जांच तेज़ की गयी जबकि रिपब्लिक टीवी के खरबपति पति मालिक राजीव चंद्रशेखर पर तमाम आरोपों के बावजूद उन्हें हर सरकारी जाँच से क्लीन चिट दी गयी। सरकार की ऐसी पक्षपात पूर्ण नीति के कारण ज्यादातर मीडिया मालिक खुद ही सत्ता के साथ खड़े हो गए। वैसे भी देश के सभी बड़े मीडिया संस्थान में कारपोरेट का अकूत पैसा लगा है इसलिए अख़बार और न्यूज़ चैनलों पर नकेल कसना सरकार के लिए और भी आसान हो गया। मोदी के लिए ये दांव अमित शाह और पियूष गोयल के अलावा पीएमओ ने खूब खेला । चैनल पर किस खबर को रोकना है और किस खबर को प्रोजेक्ट करना है इसकी गुपचुप डायरेक्ट डायल सेवा पीएमओ और चॅनेल हेड के बीच कारगर रही। जो हेड बीच में आया वो मिलिंद खांडेकर की तरह कलम कर दिया गया। और ये हेड कलम होते ही बाकी की हर कलम मोदी के पक्ष में खुद ब खुद चलने लगी।

पार्टी की तरह मीडिया पर भी हुए पूरी तरह काबिज़

पीएम मोदी ने जिस तरह मुख्यधारा की मीडिया पर आधिपत्य स्थापित किया है वो ठीक वैसा ही है जैसे उन्होंने बीजेपी जैसी बड़ी जनतांत्रिक पार्टी पर अपना और अमित शाह का राज कायम किया है। यक़ीनन पिछले पांच साल में जिस तर्ज़ पर वो पार्टी पर काबिज़ हुए उसी तर्ज़ पर उन्होंने मीडिया पर भी कब्ज़ा जमाया। अगर अडवाणी या जोशी उनकी महत्वाकांक्षा में बाधा बने तो उन्हें वैसे ही खारिज किया जैसे टीवी स्क्रीन पर रविश या पुण्य प्रसून बाजपाई को। ख़ामोशी के इस आलम में शायद जो हाल आज राजनाथ सिंह या सुषमा स्वराज का है वही हाल आज अरुण पूरी और विनीत जैन जैसे बड़े मीडिया मालिकों का भी है। चाहकर भी कोई अपनी बात सबके सामने रखने का हौसला नहीं जुटा सकता है। मोदी की इस मनोवैज्ञानिक मार ने मीडिया के हर लाला को आज सुभाष चन्द्रा के बराबर लचीला बना दिया है । शायद इसलिए यकीन नहीं होता कि जो आजतक कभी देश के कानून मंत्री और प्रधानमंत्री से जनहित में दो दो हाथ कर रहा था वो ही आजतक, आज मोदी के पॉल गोबेल्स टाइप एंकर से पत्रकारिता का दंगल लड़ रहा है। ‘सारे जहाँ से सच्चा’ ये कैसा दंगल है जहाँ सच के बजाय झूठ की नूराकुश्ती रोज़ लड़ी जा रही है।

बहरहाल हर कीमत पर हासिल जीत में सदाचार, सिद्धांत और उसूल नहीं ढूंढे जाते। जो जीतता है वही सिकंदर है। मोदी आज अगर जीते तो उन्हें मुकद्दर और मीडिया दोनों का सिकंदर कहा जायेगा।
ज़ाहिर तौर पर उनकी नीति , उनकी नैतिकता और सोच को प्रणाम।

(लेखक प्रख्यात टीवी पत्रकार हैं। लेख में व्यक्त विचार उनके निजी हैं। लेख उनकी फेसबुक वॉल पोस्ट से साभार।)

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