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मैं अपनी कहानियों को एक आईना समझता हूँ ,जिसमें समाज अपने आप को देख सके: मंटो

अनघा तेलंग

फिल्म: मंटो
निर्देशक: नंदिता दास
निर्माता: विक्रांत बत्रा, अजीत आँधरे, नम्रता गोयल,
लेखक: नंदिता दास
किरदार: नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी, ताहिर राज भसीन, रसिका दुग्गल, राजश्री देशपांडे
अवधी: 116 मिनट

हम लोगों में से कितनों ने पहले सआदत हसन मंटो का नाम सुना था, और अगर सुना भी था तोह हम उनके बारे में कितना जानते थे ?
नंदिता दास द्वारा निर्देशित फ़िल्म’मंटो’, लेखक सआदत हसन की ज़िन्दगी पर आधारित है। जो सिर्फ एक इंडो-पाकिस्तानी लेख़क थे । उनकी ज़िन्दगी के कई अलग तरह के पहलू थे।

कहानी:
फिल्म शुरू होती 1946 बम्बई से। जहां पूरा देश आज़ादी का इंतज़ार कर रहा था वही मंटो एक लघु कथा लेखक अपनी लेखनी से बॉलीवुड में स्क्रिप्ट राइटिंग का काम कर रहे थे। मंटो के सम्बन्ध प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन से ख़ास नहीं थे पर उसके कई सदस्य उनके ख़ास दोस्त थे। जिनमे फेमिनिस्ट लेखिका इस्मत चुघाटी भी शामिल थी। दोनों पर ही अश्लीलता का मुकदमा चल रहा है। मंटो के कई ख़ास दोस्तों में श्याम चड्डा और उभरते कलाकार अशोक कुमार भी शामिल थे। मंटो अपनी बीवी साफिआ और एक बेटी के साथ खुशाल ज़िन्दगी जी रहे थे और अपनी दूसरी औलाद के आने का इंतज़ार कर रहे थे।
आज़ादी के बाद साफिआ अपनी बहन की शादी लिए लाहौर चली जाती है। यहाँ बम्बई में आज़ादी के बाद के हालात कुछ ठीक नहीं थे हिन्दू-मुस्लिम के बीच के झगड़े जब मंटो की ज़िन्दगी में दखल देते हैं तो उन्हें पाकिस्तान जाना पड़ता है।
पाकिस्तान पहुंचने पर मंटो शराब और सिगरेट के आदी हो जाते हैं। जिसकी वजह से वो लिख तो पा रहे हैं , लेकिन उनका परिवार उनसे दूर होता चला जा रहा है। इसी दौर में मंटो अपनी सबसे प्रभावशाली कहानियां लिखते हैं। फिर भी मंटो को बहुत सी मानसिक, आर्थिक और सामाजिक मुसीबतों से घिरे रहते हैं। अंत में….. ये शायद आप फिल्म देख कर ज़्यादा अच्छे से जान और समझ पाएंगे।

निर्देशन:
बतौर निर्देशक ये नंदिता दास की तीसरी फिल्म है और उनका काम सरहानीय है। एक लेखक का व्यक्तित्व काफी अलग होता है और अगर लेखक मंटो जैसा हो तो वो काफी ही अलग होता है। मंटो हमेशा ही समाज के अनछुए पहलुओं को छूते थे। दास का निर्देशन काफी अच्छा है। उन्होंने कलाकारों को बिल्कुल जचते हुए किरदार सौपें और उनसे सहज तरीके से अभिनय करवाया। हालांकि मंटो के जीवन के और पहलुओं को छुआ जा सकता था ताकी दर्शकों को उनके बारे में और जानने को मिलता।

कास्टिंग:
नवाज़उद्दीन सिद्दीकी ने मंटो के किरदार के साथ पूरी तरह से न्याय किया है। नवाज़ पूरी तरह से किरदार के साथ घुल-मिल गए थे और लगा जैसे की परदे पर हम जिसे देख रहे है वही सआदत हसन मंटो है। इसके अलावा रसिका दुग्गल उनकी बीवी साफिआ के किरदार में खूब जचि हैं और उनका अभिनय भी सराहनीय है। इसके अलावा ताहिर राज भसीन, जावेद अख्तर, चन्दन रॉय सान्याल, ऋषि कपूर, रणवीर शोरी, राजश्री देशपांडे, इला अरुन, दिव्या दत्ता, और बाकी कलाकारों ने अपने किरदारों के साथ न्याय किया है।

डायलॉग:
इस फिल्म की ख़ूबसूरती इसके प्रभावशाली डायलॉग हैं। नवाज़ ने इन डायलॉग को उतनी ही प्रभावशाली तरीके से बोला भी है। डायलॉग दर्शकों को सोचने पर मजबूर कर देता है और कभी-कभी रौंगटे खड़े कर देने वाली स्थिति भी आ जाती है। डायलॉग में उर्दू के शब्दों का ख़ास प्रयोग किया गया है और मंटो के लिखने की शैली के हिसाब से ही नवाज़ के डायलॉग लिखे गए हैं।  डायलॉग इस फिल्म को पूरा और सराहनीय बनाते है।

संगीत:
फिल्म का संगीत निर्देशन स्नेहा खनवलकर और रफ़्तार ने किया है और गानों को लेखनी दी हैं। दिबाकर बैनर्जी, सीमाब अकबरबादी, मीरजी, फैज़, अहमद फैज़, रफ़्तार, और मंटो ख़ुद। साथ ही इन गानो को आवाज़ दी है शंकर महादेवन, रेखा भारद्वाज, राशिद खान, विध्या शाह, रफ़्तार और नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी ने।

पूरी तरह देखा जाए तो मंटो ने सआदत हसन मंटो के जीवन के कई पहलुओं को दिखाने में सफल हुई है पर कई पहलू ऐसे भी है जिन्हें जोड़ा जा सकता था। सआदत हसन मंटो जीवन को दिखाने के लिए ये एक अच्छा प्रयास था।

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