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ब व कारन्त ने की थी आत्महत्या की कोशिश: अजीत राय

-स्व. कारन्त के रंगअवदान पर पांच दिवसीय आयोजन के पहले दिन हुआ व्याख्यान

न्यूज़क्रस्ट संवाददाता,भोपाल।।

रंगमंडल में अपने अभिनव प्रयोगों व योगदान के लिए देश-विदेश में प्रसिद्ध नाट्यकर्मी स्व. ब व कारन्त पर आधारित वक्तव्य सत्र का आयोजन किया गया। शनिवार से भारत भवन में शुरू हुए इस पांच दिवसीय कार्यक्रम के पहले दिन अतिथि वक्ताओं ने श्री कारन्त के जीवन के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला।

कारन्त जी के कारण बन सका सफल निर्देशक: नागभरणा

श्री कारन्त के रंगअवदान पर वक्तव्य के सत्र में बंगलुरु से आये वरिष्ठ नाट्यकर्मी व अभिनेता टीएस नागभरणा ने कारन्त के साथ अपनी यादों को साझा किया। याद करते हुए बताया कि वे वर्ष 1973 में पहली बार सहायक निर्देशक के रूप में भोपाल आये और ब व कारन्त के साथ नाटकों को लगातार करते रहे। उन्होंने बताया कि वे सोलह वर्ष की उम्र में कारन्त के साथ जुड़ गए थे। कारन्त के नाटकों से जुड़ाव पर बोलते हुए नागभरणा ने बताया कि उनके नाटक अब चौथी पीढ़ी कर रही है। यह उनके नाटकों का आकर्षण है। वे गुरु शिष्य परंपरा पर ज्यादा गंभीर विचार नहीं रखते थे। पर मैंने आज भी उनके साथ गुरु शिष्य परंपरा का निर्वहन किया।
निंजा भी सीखता था संगीत: नागभरणा ने बताया कि कारन्त के सिखाने का जादू यहां तक था कि उनका पालतू श्वान निंजा हारमोनियम बजाने के साथ ही गाना शुरू कर देता था। वे उसे भी प्रशिक्षण देते थे। हम सब कारन्त के परिवार के सदस्य ही थे। वह थिएटर के अवधूत थे। वे आज भी मौजूद हैं। कहीं भी जाइये लोग आज भी उनके योगदान को जानते है। उन्हें मानुषीसिद्धि प्राप्त हुई रंगमंच के जरिये। बाल नाट्यरंग में उन्होंने 34 साल तक वर्कशॉप किये। हर बार दो नए नाटक तैयार किये जाते थे। उनके साथ काम करने से मैंने चार बाल फिल्में बनाई जिनमें से दो को अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त हुई। मैंने उनके साथ स्टेज के पीछे से काम शुरू किया। वे जब भी बंगलुरु आते थे तो लगातार तीन नाटक करते थे। वहां के रंगकर्मी उनको घेरे रखना चाहते थे। वे सबके लिए कुछ न कुछ करते रहते थे। मैं हर छोटी-बड़ी बातों का ध्यान रखता था। उनके साथ रहने के कारण ही मैं निर्देशक बन सका। मेरी बनाई 30 फिल्मों में से 20 फिल्मों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पुरुस्कार भी मिले। कारन्त ने मुझे इनके लायक बनाया। बच्चों पर संगीत रचने के विषय पर नागभरणा ने बताया कि वे बच्चों को फ्री छोड़ देते थे। उनकी मस्ती की आवाज़ों से संगीत रचते थे। यह रचित संगीत व धुनें सबको पसंद आतीं थीं। वे कलाकारों को खाली हॉल में भी वैसे ही नाटक करने को बोलते थे जैसे हॉउसफुल शो में प्रदर्शन के दौरान करते हैं। तब ही सच्चे कलाकार की पहचान होती है। उनके बनाये नाटक में स्तिथि यह होती थी कि रंगशंकरा थिएटर के बाहर एक बैनर लगाने से ही वह हाउसफुल हो जाता था। उनके नाटक “हयवदन” नाटक को नाटकों पर कोलोनियल प्रभाव से भरतमुनि नाट्यशास्त्र की ओर मुड़ने वाला बिंदु कहा जाता है। थिएटर में टिकट लागू करवाने का भी श्रेय कारन्त को जाता है। उससे पहले पास व्यवस्था करके दर्शक आते थे। नागभरणा याद करते हुए बताते हैं कि एक बार एक नाटक के मंचन के बाद भी कारन्त नहीं दिखे। जब उन्हें ढूंढते हुए उनके कमरे जाकर पूछा गया कि वे कहां थे तो उन्होंने पलटकर पूछा कि नाटक कैसा हुआ? बताने पर कि वह दर्शकों द्वारा खूब सराहा गया है तो उन्होंने फिर पूछा कि क्या मैं आज भी निर्देशन कर सकता हूँ? लंबे अनुभव के बाद भी यह पूछना उनकी सादगी की निशानी थी।

जब इलैयाराजा पहुंचे संगीत की रिकॉर्डिंग देखने:कारन्त के फिल्मों में संगीत देते देखने के लिए इलैयाराजा खुद आये। चोमुद्गड़ी नाम फ़िल्म में उन्होंने आठ लोगों से संगीत तैयार करवाया। नारियल के खोल और पत्थरों से संगीत तैयार करवाया जिसे खूब सराहा गया। अंत में नागभरणा ने कारन्त के योगदान पर बारह बिंदु बताये जिनसे थिएटर में बदलाव आए जो आज तक जारी है। उन्होंने कहा कि कारन्त आज भी एक बहती नदी के समान हैं।

कारन्त तैरना जानते थे, आत्महत्या नहीं कर पाए: अजित राय, रंग-प्रसंग के संपादक


मेरी मुलाकात कारन्त जी से दिल्ली में होती रहती थी। हबीब तनवीर के 80वें जन्मदिन की शाम उनके देहावसान की सूचना आयी। एक महान कलाकार के जन्मदिवस पर दूसरा दुनिया छोड़ गया। आधुनिक हिंदी रंगमंच का रिकॉर्ड लगभग साठ साल का ही कहा जा सकता है। भारतेंदु हरिश्चंद्र के समय को लोकमंच का नाटक कहा जाता है। कारन्त के सच्चे वारिस आलोक चटर्जी और संजय उपाध्याय हैं। लांछन लगने के बाद कारन्त का स्वयं पर से विश्वास डिग गया था। बाद में वे लांछन से मुक्त भी हुए। यह इतिहास में पहली बार ही हुआ होगा कि कर्नाटक के तत्कालीन मुख्यमंत्री ने उन्हें स्वयं खुद चिट्ठी लिखकर सक्रिय होने को कहा। आज के नौजवान कारन्त को कैसे ग्रहण करें यह बड़ी चिंता विषय है? वे गरीब परिवार में जन्में थे। समस्त गुरुओं से शिक्षा प्राप्त की। कारन्त ने बनारस में गंगा में डूबकर मरने का प्रयास किया। पर वे तैरना जानते थे, नहीं डूबे। वे ताउम्र प्रेम के लिए भी तरसते रहे। कारन्त जी सभी विचारधाराओं के बीच रहे। पंद्रह दिन संघ से बनारस में जुड़े रहे। कम्युनिस्ट के बीच गए और कम्युनिस्टों ने उनकी शादी भी करवाई। वे राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में निदेशक बने। उन्होंने एनएसडी की बंद खिड़कियों को समाज के लिए खोला। जब स्थिरीकरण आया वे छोड़कर चले गए। ऐसे ही भारत भवन में रंगमंडल स्थापित हो रहा था वे यहां से भी चल दिये। ऐसा ही रंगायना के साथ हुआ। उनकी यह तीन बड़ी असफलताएं कहीं जा सकती हैं उनकी। उनका सबसे बड़ा योगदान रंग संगीत है। उनकी बनाई फ़िल्म ‘चोमनाडूटी’ में उन्होंने धर्मपरिवर्तन और उसके प्रमुख किरदार का परिस्थितियों में विलीन होने का बहुत अच्छा चित्रण किया। समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति की बात करने की बात कारन्त करते थे। कारन्त जी ज़माने में संस्कृति को सहयोग करने का तंत्र मजबूत करते थे जो अब नहीं हो रहा है।

वे आंखों व हरकत की भाषा पढ़ना जानते थे: राजकमल नायक,स्वतंत्र रंगकर्मी


कारन्त जी के साथ सत्रह वर्षों तक काम करने का अवसर मिला। वे विलक्षण ही नहीं विचक्षण रंगकर्मी थे। उनके लिए ‘थे’ शब्द का सम्बोधन खटकता है। वे आज भी आसपास ही महसूस होते हैं। रंगशैली, रंगसंगीत, रंगविस्तार और रंगसंस्कार उनकी चार खासियत थी। कारन्त जॉर्ज बर्नार्ड शॉ की उक्ति ‘स्वर्णिम नियम यह है कि कोई स्वर्णिम नियम ही नहीं हो’ निभाते हुए दिखते हैं। वे दूसरे भारतेंदु हरिश्चंद्र कहे जा सकते हैं। वे देशभर में घूमते रहे। सीखते व सिखाते रहे। एनएसडी के निर्देशक रहते हुए उन्होंने स्वर्णिम नियम का निर्वहन किया। मैनें उनके साथ भारत भवन के रंगमंडल में रहते हुए आठ डायरियाँ बनाई हैं। उसमें ब व कारन्त के समस्त उद्धरण हैं। वे आंखों की भाषा, हरकत की भाषा को पढ़ना जानते थे। आंट फिशर की किताब ‘कला की जरूरत’ में देश को समझने के लिए कला की भूमिका के बारे में बताया। सत्र के अंत में नायक ने वर्ष 1985 में अपनी डायरी के नोट्स को पढ़कर भी सुनाए। इसमें कारन्त की बताई सीख और व्याख्या का विशेष उल्लेख रहा। नायक ने रंगकर्मी जॉन मार्टिन के साथ किये गए कारन्त के वर्कशॉप के बारे में विशेष रूप से बताया।

कारन्त के रंग संगीत की हुई प्रस्तुति:

प्रख्यात रंगकर्मी स्व. ब व कारन्त के नाटकों के गीतों की मधुर प्रस्तुति भी हुई। प्रकृति के सुकुमार कवि के रूप में प्रसिद्ध सुमित्रानंदन पंत की कविताओं की श्री कारन्त द्वारा लयबद्ध कृतियों की प्रस्तुति राजीव सिंह व उनके साथियों द्वारा दी गयी। महानिर्वाण नाटक के गीत ‘देह रहे अथवा छूटे’ व ‘नहीं रहना अब देस बिराना’, हे बदन नाटक का ‘बांचे जो बानी कथा पुरानी’। अंतिम प्रस्तुति मालविका अग्निहोत्रम नाटक का ‘फाल्गुन आ गओ, सबरंग छा गओ’। गायन व वादन में राजीव सिंह, रंजना तिवारी, बिशना चौहान, मोहम्मद फैज़ान, संजना, पुष्पेंद्र सिंह ठाकुर, राहुल चौहान, मुस्कान सोनी, रवि राव, अनूप जोशी ‘बंटी’ ने अपनी प्रस्तुति से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।

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One Comment

  1. सतीश चंद यादव सतीश चंद यादव September 5, 2018

    बहुत ही बढ़िया सर जी…

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